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दुनिया को वृक्ष वनस्पति प्रेमी विकास तंत्र की जरूरत
DASTAKTIMES
|July 2024
ऋग्वेद में औषधि विज्ञान सम्बंधी एक सूक्त के देवता औषधि हैं। ऋषि कहते हैं, 'हे औषधियों आपके सहस्त्रों नाम हैं। सहस्त्रों अंकुर हैं। आप हमें आरोग्य दें।' वे औषधियों की रोग निवारक शक्ति की तुलना घोड़े की शक्ति से करते हैं। स्तुति है, 'आप गतिशील घोड़े की तरह रोगों को तेजी से दूर करती हैं। आप हमें सुख दें।'
वातावरण में तनाव है। पृथ्वी का ताप बढ़ रहा है। सभी जीव व्यथित हैं। प्रकृति में अनेक जीव हैं। सब शुद्ध प्राण वायु पर निर्भर हैं। प्राण वायु का मुख्य स्रोत वनस्पतियां हैं। भारतीय राष्ट्रजीवन में वनस्पतियां, औषधियां देवता की श्रेणी में हैं। पीपल, बरगद, नीम, बेल आदि वृक्षों की उपासना होती है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि, 'पीपल का वृक्ष मैं ही हूं।' भारत की तरह दुनिया के किसी भी अन्य देश, संस्कृति व सभ्यता में शुद्ध वनस्पतियों और वृक्षों को नमस्कार नहीं किया गया। वनस्पतियों के कारण पर्यावरण रहता है। दुर्भाग्य से सारी दुनिया में वन क्षेत्र घटा है। भूमण्डलीय ताप बढ़ा है। वर्षा चक्र गड़बड़ाया है। यहां भारत में वैदिक काल से लेकर पुराण और महाभारत में वनस्पतियों और वृक्षों को विशेष आदर के साथ याद किया गया है। उन्हें देवता जाना गया है। हिन्दू मन वृक्ष वनस्पति की कटान पर आहत होता है। विकास का आधुनिक माडल वनस्पति प्रेमी नहीं है। विश्व को वृक्ष वनस्पति प्रेमी विकास तंत्र की आवश्यकता है।
वृक्ष बोलते हैं संभवतः। सुनते अवश्य हैं। उनसे वार्ता करना आनंद का अनुभव है। एक शोध के अनुसार जिस पौधे से प्रेमपूर्ण वार्ता होती है, वह जल्दी बढ़ता है। पौधों को ध्यान और प्रेम से देखने वाले प्रसन्न रहते हैं। पेड़ पौधे आपस में भी बातें करते होंगे। वे वृक्ष प्रेमी को देखते ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे कुल्हाड़ी लेकर आने वाले 'पेड़ कटवा' को देखकर सहम जाते हैं। गहन उदास होते हैं। वृक्ष वनस्पति हमारे परिजन हैं। इन्हें खिलने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। बीज से वृक्ष, वृक्ष से फूल और फूलों से बीज का वर्तुल पूरा होना चाहिए।
This story is from the July 2024 edition of DASTAKTIMES.
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