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फिल्म 'चक्का जाम' में प्रेम कहानी का विलेन है आरक्षण आंदोलन...
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|Mayapuri Edition 2675
एक तरफ बड़े बजट की स्टार कलाकारों वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धूल चाट रही हैं, तो दूसरी तरफ प्रांतीय सिनेमा के वाहक जमीन से जुड़ी कहानियाँ पेश कर रहे हैं। ये प्रांतीय फिल्मकार उन तबकों की कहानियों पर फिल्में बना रहे हैं, जो लम्बे समय से हाशिए पर रही हैं। ऐसे ही फिल्मकार हैं गजेंद्र शंकर श्रोत्रिय, जो ग्रामीण परिवेश, राजनीतिक परिवेश और आदिवासी पृष्ठभूमि पर इंसानी जटिल रिश्तों को उकेरने वाली फिल्में बहुत अच्छे स्तर पर बना रहे हैं और इंटरनेशनल स्तर पर पुरस्कार भी बटोर रहे हैं।
फिल्मकार गजेंद्र शंकर श्रोत्रिय ने अपनी पहली राजस्थानी फीचर फिल्म “भोभर” से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। उसके बाद उन्होंने अपनी हिंदी फिल्म 'कसाई' के जरिए कई ऐसे सवाल उठाए, जो आज समाज और समय की जरूरत हैं। राजस्थान के कुछ गाँवों में प्रेतात्मा, भूत आदि को गजेंद्र ने 'कसाई' के माध्यम से संबोधित किया। इसके बाद उन्होंने नारी सशक्तिकरण के मुद्दे पर वेब सीरीज “वकील साहिबा” बनाई। फिर ग्रामीण परिवेश में इंसान के बंदूक उठाने की वजहों को रेखांकित करने वाली फिल्म “भवानी” बनाई। और अब आरक्षण आंदोलन के बैकड्रॉप पर प्रेम कहानी वाली फिल्म “चक्का जाम” बनाई, जो कि 28 नवंबर से ओटीटी प्लेटफॉर्म “स्टेज” पर स्ट्रीम होगी।
पेश हैं गजेंद्र शंकर श्रोत्रिय से हुई बातचीत के खास अंश
अब तक की अपनी फिल्मी यात्रा को किस तरह देखते हैं?
– मुझे फिल्में बनाते हुए 18 वर्ष हो गए। मैं खुद को स्व-प्रशिक्षित फिल्म निर्देशक मानता हूँ। मैंने बतौर सहायक निर्देशक भी किसी के साथ काम नहीं किया। फिल्म मेकिंग की कोई ट्रेनिंग नहीं ली। मैंने जो कुछ सीखा, वह सब भारतीय व विश्व सिनेमा को देखकर ही सीखा। सच कहूँ तो साठ व सत्तर के दशक का सिनेमा देखकर मेरे अंदर सिनेमा के प्रति रुझान पैदा हुआ। मैंने सबसे पहले सीखा कि फिल्म की स्क्रिप्ट कैसे लिखी जाती है। इसके लिए कुछ स्क्रिप्ट पढ़ीं। मतलब फिल्म मेकिंग की मेरी प्रक्रिया काफी रोचक रही है। सीखने का क्रम तो आज भी जारी है। अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। हर फिल्म के बाद एहसास होता है कि कुछ कमी है। 18 वर्षों बाद मुझे लगता है कि अब मैं बेहतरीन विद्यार्थी हो गया हूँ। पहले मुझे पता नहीं था कि मुझे क्या सीखना है, पर अब पता है कि मुझे क्या सीखना है। अपने अंदर की कमियों का अब मुझे एहसास है। जब मेरे पास नई फिल्म आती है, तो मेरी कोशिश होती है कि मैं पुरानी कमियाँ न रहने दूँ।
18 वर्षों के अंतराल में आपने कई फिल्में निर्देशित कीं। पर किस फिल्म ने आपको संतुष्टि प्रदान की?
This story is from the Mayapuri Edition 2675 edition of Mayapuri.
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