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हरी खाद-स्वस्थ भूमि व अधिक उपज

Modern Kheti - Hindi

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15th August 2024

भूमि की उपजाऊ शक्ति और फसलों की अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी के भौतिक, जैविक एवं रासायनिक गुणों की सही मात्रा और बढ़िया अवस्था में होना बहुत जरूरी है। परन्तु, रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग, सघन कृषि, गेहूं- धान फसल चक्र एवं अति विश्लेषित खादों के प्रयोग से न सिर्फ लोगों की सेहत खराब हो रही है, बल्कि इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी नुकसान हो रहा है।

- रेनू देवी, रुपेश शर्मा, योगिता बाली

हरी खाद-स्वस्थ भूमि व अधिक उपज

किसानों के सामने यह सबसे गंभीर समस्या है। इसलिए रासायनिक खादों के विकल्प को अपनाना समय की मांग है। इससे खेती की लागत को कम करके फसलों की प्रति एकड़ उपज को बढ़ाया जा सकता है। हरी खाद जैविक खेती का एक महत्वपूर्ण अंग है। प्रस्तुत लेख में हरी खाद के बारे में विस्तार से चर्चा की जा रही है।

हरी खाद क्या है :

हरे पौधों को खेतों में उगाकर, उसे मिट्टी में मिलाने को ही हरी खाद कहते हैं। हरी खाद के लिए उन पौधों को उचित माना जाता है जिनकी बढ़वार तेजी से होती है और पत्ते ज्यादा होते हैं। इन पौधों की जड़ों में राइजोबियम नाम के जीवाणु पाए जाते हैं जो पर्यावरण से नाइट्रोजन को पौधों की जड़ों में बनी गांठों में एकत्रित करते हैं। पौधे जब अपरिपक्व अवस्था में हों और पौधों में फूल निकलने प्रारंभ हो गए हों, उस अवस्था में हैरो से पौधों को उसी खेत में दबा दिया जाता है। इस विधि को सीटू विधि कहते हैं। इस अवस्था में कार्बन नाइट्रोजन अनुपात कम होता है और इस प्रकार ये पौधे गल सड़कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं।

हरी खाद बनाने की विधि :

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