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मेंथा की अंतरवर्ती खेती गेहूँ के साथ
Modern Kheti - Hindi
|15th February 2024
मेंथा की बुवाई 30 से. मी. आकार की कूंड़ में की जाती है। मेंथा के लिए लगभग 500 किलो सकर्स एक हैक्टेयर के लिए आवश्यक हैं। 10-12 सैं.मी. लंबाई के सकर्स को कुंड में 60-75 की दूरी पर 5-1 सैंमी की गहराई पर बुवाई की जानी चाहिए। कुंड-मेढ़ बुवाई विधि से उपज की हानि के बिना 40 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है।
रबी ऋतु में उगाई जाने वाली फसलों में गेहूँ का महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान में हमारे देश में गेहूँ की खेती लगभग 28 मिलियन हैक्टेयर में की जाती है। गेहूँ और मेंथा की एक साथ बुवाई कुंड-मेढ़ विधि से की जाती है। उत्तरांचल एवं मध्य यूपी के तराई जिलों के अलावा पंजाब के कुछ क्षेत्रों में मेंथा उगाया जाता है। अत: गेहूँ को मेढ़ पर बोया जाता है और मेंथा को कुंड में बोया जाता है। गेहूँ की बुवाई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 से 22.5 सें.मी. रखी जाती है। दोनों फसलों को एक साथ उगाकर कम समय व कम क्षेत्र में अधिक आय प्राप्त की जा सकती है। मेंथा (पुदीना) एक नगदी फसल है। विश्व में मेंथा (पेपरमिंट) के तेल की अधिक मांग है। मेंथा ऑयल इसके पत्तों से तैयार किया जाता है। मेंथा का उपयोग दवाईयां बनाने से लेकर सौंदर्य प्रसाधन और भोजन में उपयोग होने के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है। मेंथा ऑयल मुख्य रूप से पेपरमिंट और स्पीयरमिंट प्रजातियों से प्राप्त होता है और इसका फार्मास्यूटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन और स्वाद सहित विभिन्न उद्योगों में प्रयोग किया जाता है। मेंथा ऑयल को फार्मेसी में विभिन्न दवाओं और टॉपिकल क्रीमों के रूप में उपयोग किया जाता है। मेंथा ऑयल खुशबू वाले उत्पादों जैसे कि टूथपेस्ट, माउथवाश, शैंपू, तरल परफ्यूम, बॉडी लोशन और दर्दनाशक क्रीम आदि में उपयोग किया जाता है। मेंथा ऑयल को खाद्य उद्योग में जैसे मसाले, च्यूइंगम, कैंडी, चॉकलेट, टॉफी, चाय, नमकीन, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट और मिठाई में उपयोग किया जाता है। मेंथा ऑयल को ग्रोसरी उत्पादों आदि में उपयोग क
This story is from the 15th February 2024 edition of Modern Kheti - Hindi.
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