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वैश्विक ताप से बदलता मौसम का रुख
Jansatta Lucknow
|August 29, 2025
चिंताजनक यह है कि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ कई अन्य दूसरी आपदाएं भी अगले दो दशकों में विश्व को घेरने वाली हैं। इससे स्वास्थ्य पर भी बुरा असर अभी से पड़ रहा है। अफसोस की बात है कि हम अब भी इससे बेखबर हैं।
पि छले सोलह वर्षों में पहली बार मानसून ने जल्द दस्तक दी। नौतपा के दौरान ठंडक ने हैरान किया, तो जूनजुलाई और अगस्त में बारिश ने बेहाल भी किया।
बाढ़ और बादल फटने से मची तबाही की तस्वीरों के बीच उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में उजड़ते-ढहते गांवों की तस्वीरों ने बेहद परेशान किया। कृषि के साथ समूचे जन-जीवन पर असर पड़ा है। अभी भी बादल फटने या भारी बरसात से तबाही की खबरें आ रही हैं। नुकसान का सही-सही अंदाजा लगाने के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा। विडंबना यह है कि कुछ वर्षों से समझ नहीं आ रहा है कि कब कौनसी ऋतु चल रही है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक बीते आठ महीनों में कहीं बाढ़ से हाहाकार, तो कहीं लू ने पसीने छुड़ा दिए।
इस वर्ष जुलाई तक बाढ़, तूफान, भूस्खलन और बिजली गिरने संबंधी आंकड़ों के मुताबिक, 1626 लोगों की जान गई और 1.57 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि पर लगी फसल बर्बाद हो गई। वास्तविक आंकड़े ज्यादा ही होंगे। उत्तराखंड से केरल या हिमाचल से असम तक मौसम के बिगड़े मिजाज ने कोहराम मचाया। उत्तराखंड में धराली गांव हो, हिमाचल के मंडी की सिराज घाटी या फिर जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ का चशोटी, वहां बादल फटने से भारी जन-धन हानि हुई। अभी नुकसान के सही-सही और पूरे आंकड़े आने में थोड़ा समय लगेगा। इस साल कई जगहों से आई तबाही की तस्वीरों ने कई प्रभावित क्षेत्रों का नक्शा बिगाड़ दिया।
दरअसल, मई का लगभग पूरा महीना बारिश, आंधी, तूफान और प्राकृतिक आपदाओं के साथ बीता, तो जून-जुलाई और अगस्त में अब तक हुई भारी बारिश ने कहर बरपाया। मौसम का बदला मिजाज हैरान करने वाला जरूर है, लेकिन कारण सबको पता है। देश के कई क्षेत्रों में एक मई को पहले जैसी गर्मी नहीं पड़ी, बल्कि बीते दिसंबर में भी कड़ाके की ठंड गायब थी। बार-बार सक्रिय होते पश्चिमी विक्षोभ ऐसी असामान्य स्थितियों की वजह हैं। विशेषज्ञ इसका कारण जलवायु परिवर्तन बताते हैं। ऐसे में जल संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कटौती अब जरूरी है।
Diese Geschichte stammt aus der August 29, 2025-Ausgabe von Jansatta Lucknow.
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