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पूर्वजन्म के कर्म सच या अंधविश्वास
Sarita
|April First 2025
जो विश्वास तर्क पर आधारित नहीं, वह रेत पर बने घर के समान है, जो समय की कसौटी पर टिक नहीं सकता.
तीन मित्र-2 महिलाएं और एक पुरुष-लोनावला के तुंगार्ली जंगल और बांध की सैर के बाद लौट रहे थे. संकरे और क्षतिग्रस्त रास्ते पर उखड़े हुए पत्थरों पर से उन की एसयूवी धीरेधीरे आगे बढ़ रही थी. रास्ते में स्कूल यूनिफौर्म पहने कुछ लड़कियां शायद तुंगार्ली बांध के आगे राजमाची गांव को लौट रही थीं. वहीं, बांध से रिसने वाले पानी का एक छोटा सा सोता फूट पड़ा था, जिस में से एक लड़की पीने के पानी की बोतल भर रही थी.
2 आदिवासी महिलाएं सिर पर लकड़ी के गट्ठर उठाए सड़क पार करने के लिए उन की गाड़ी के गुजरने का इंतजार कर रही थीं. उन के फटे हुए कपड़े, कृशकाय शरीर और धूप से जली गहरी त्वचा देख कर सैलानियों का दिल करुणा से भर आया.
पुरुष ने गाड़ी रोक कर उन्हें रास्ता पार करने का इशारा किया और अपने मित्रों से बोला, "यहां तो समय ठहर गया है. ये लोग जैसे पचास या सौ साल पहले की जिंदगी जी रहे हैं."
एक महिला ने दार्शनिक लहजे में कहा, "यह तो महज संयोग है कि उन्हें गरीबी में जन्म मिला और हमें खातेपीते घरों में. यह संभव है कि हम 'वह' होते और वे 'हम'. इसलिए हमारा अपने जीवन पर गर्व करना बेकार है."दूसरी महिला ने तुरंत जोड़ा, "यह पूर्वजन्म के कर्मों का फल है." फिर इसी विषय पर तीनों में गंभीर चर्चा शुरू हो गई.
पहली महिला की व्याख्या- संयोग या गणितीय प्रायिकता (संभावना) वैज्ञानिक आधार दर्शाती है, भले ही जन्म और मृत्यु विज्ञान के लिए आज भी गूढ़ रहस्य बने हुए हैं. लेकिन 'पूर्वजन्म के कर्म' वाली व्याख्या अकसर धार्मिक चर्चाओं में सुनाई देती है. तीनों मित्रों को यह विचार बेमानी लगा कि सिर पर लकड़ी ढोती गरीब महिलाएं पिछले जन्म के पापों का फल भुगत रही हैं. न्याय की बात करें तो अपराध का विवरण सुने बिना दंड मिलना अनुचित है. क्या धर्म के पुरोहित इन गरीबों को उन के कथित अपराधों का विवरण दे सकते हैं?
Diese Geschichte stammt aus der April First 2025-Ausgabe von Sarita.
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