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एबौर्शन

Sarita

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December First 2025

निशा आज उसी दोराहे पर खड़ी थी जिस पर कभी उस की मां खुद उद्विग्न सी छटपटा रही थी. मगर आज उचित मार्गदर्शन करने के बजाय वह निशा पर उबल पड़ी थी. आखिर क्यों?

- भगवती प्रसाद द्विवेदी

एबौर्शन

सुरेश ने सुषमा की कलाई पकड़ ली. गुस्से से उस का दाहिना हाथ भी उठ गया. इच्छा हुई कि वह पत्नी को दोतीन चपत लगा दे. मगर कुछ सोच कर उस ने हाथ पीछे खींच लिया. निशा सिसकते हुए अपने कमरे में समा गई.

"मारो, मारते क्यों नहीं?" सुषमा ने हाथ झटकते हुए कहा.

सुरेश ने कुछ भी जवाब देना उचित नहीं समझा और अपने कमरे में वापस लौट, कुरसी खींच कर बैठ गया. फिर दाहिने हाथ की हथेली से माथा पकड़ लिया. सुषमा भी पलक झपकते ही उसी कमरे में दाखिल हो गई.

“और बहकाओ बेटी को, बदनामी तो तुम्हारी ही होगी न ? मुझे क्या,” सुषमा ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा.

काफी देर तक कोसने के बाद भी जब सुरेश ने कोई उत्तर नहीं दिया तो सुषमा पैर पटकते हुए चली गई. सुरेश ने थोड़ी देर के लिए राहत की सांस ली.

मगर तभी सुषमा के जलेकटे शब्द पिघले सीसे की मानिंद उस के कानों में उथलपुथल मचाने लगे. उसे सुषमा से सहानुभूति हो आई. हां, ठीक ही तो कह रही है वह. बदनामी तो अपनी ही होगी न ?

एकाएक उस का मन उद्विग्न हो उठा. एक दफा जी में आया कि वह अभी जा कर निशा का गला दबा दे. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. तभी उस के अंतर्मन में बसा साहित्यकार उसे बारबार धिक्कारने लगा, छिः, कैसे दोमुंहे सांप सरीखे घटिया इंसान हो तुम. साहित्य में तो ऊंचीऊंची बातें करते नहीं अघाते, हरदम आदर्श बघारते हो. मगर परदे के पीछे ऐसे नीच विचार. कितने स्वार्थी हो तुम. क्या अपने वे दिन भूल गए, तुम दोनों ने भी ऐसे ही गुल खिलाए थे. किंतु तुम दोनों के अपराध की सजा भुगतनी पड़ी एक तीसरे मासूम को. शर्म नहीं आती ऐसी ओछी बातें सोचते हुए.

सुरेश का माथा एकबारगी झनझना उठा. आंखें मूंद कर उस ने ज्यों ही सिर झटकने की चेष्टा की, 25 साल पहले का वह दृश्य उस के मानसपटल पर एकाएक अंकित हो गया.

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