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बदल गए हैं गणतंत्र दिवस के मायने

Sadhana Path

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January 2026

देश का संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में हमारे देश में प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। लेकिन देश की आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्या हम हमारा लक्ष्य हासिल कर पाए हैं ? आइये, विचार करते हैं।

- डॉ. अनामिका प्रकाश श्रीवास्तव

बदल गए हैं गणतंत्र दिवस के मायने

गांधी जैसी अहिंसा की प्रतिमूर्ति और आजाद, भगत और सुभाष जैसे रणबांकुरों की स्वतंत्रता के लिए अदम्य इच्छाशक्ति और शौर्य के परिणामस्वरूप ही हम अंग्रेजी हुकूमत को छिन्न-भिन्न कर 15 अगस्त 1947 को आजादी के सूर्य को शत-शत प्रणाम कर पाए, लेकिन अपने बनाए कानूनों की राह पर चलने का सपना अभी भी अछूता था। हमारे पास नियम-कानूनों के रूप में अभी अपना कोई स्वतंत्र संविधान नहीं था और रातों-रात इतने विशाल देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के मुताबिक कायदे-कानून बनाने असंभव थे, लिहाजा जब तक हम अपना स्वतंत्र संविधान निर्मित करते तब तक अंग्रेजों के बनाए कानूनों के आधार पर ही हमें अपनी नीतियों का निर्धारण करना था। इसलिए बराबर एक छटपटाहट थी, बेचैनी थी और था अधूरी आजादी का एक तीखा एहसास, जिससे मुक्ति हमें सिर्फ अपना संविधान लागू करके ही मिल सकती थी।

अधूरी आजादी की यंत्रणा हमें तीन साल तक भोगनी पड़ी क्योंकि इतने विशाल राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखते हुए एक सम्पूर्ण संविधान का निर्माण कुछ ही महीनों में निर्मित कर देना राज पुरोधाओं के लिए संभव न था। अधूरी आजादी की इस छटपटाहट का अंत हुआ 26 जनवरी 1950 को, जब हमने देश की तमाम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण कर विशाल संविधान का निर्माण करते हुए अंग्रेजों के कुटिल कानूनों की चिता जलाते हुए उनसे सदा-सदा के लिए मुक्ति पा ली।

आज भी लड़खड़ा रही है व्यवस्था

आज ही के दिन विश्व के एक शक्तिशाली प्रभुतासम्पन्न गणतंत्र की शीर्ष सूची में हमारे देश का नाम भी जुड़ गया। इस संविधान के आधार पर ही हमारे राष्ट्र नायकों ने एक ऐसे गौरवशाली और शक्तिशाली भारत की कल्पना की थी जो धर्मनिरपेक्षता की अनूठी मिसाल कायम करते हुए लघु विश्व के रूप में प्रतिष्ठित होगा। जहां सभी धर्म, जाति-सम्प्रदाय, मत-मतान्तर और संस्कृतियां एक ही पुष्प-गुच्छ में पल्लवित-पुष्पित होकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का आदर्श प्रस्तुत करेंगी।

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