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मकर संक्राति का अध्यात्मिक महत्त्व
Sadhana Path
|January 2026
यूं तो हम सभी के लिए त्योहारों का मतलब होता है हंसी, उल्लास और उमंग लेकिन सही मायनों में त्योहारों का महत्त्व उससे कहीं बढ़ कर और गूढ़ होता है।
भारत के अनेक पर्वों और त्योहारों में 'मकर संक्रांति' की अपनी अलग एक पहचान है। वर्ष में यही एकमात्र पर्व है, जो 'सौर पंचांग' के आधार पर मनाया जाता है। सूर्य जब अपनी परिक्रमा के बीच धनुराशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, तो मकर संक्रांति होती है। दो राशियों के संक्रमण के साथ ही इस दिन को दो ऋतुओं (शिशिर और बसंत) का संघिकाल भी माना जाता है।
शीत पर धूप की विजय के रूप में मनाया जाने वाला मकर संक्रांति का पर्व, प्रायः पौश (पूस) मास में पड़ता है, जबकी पूस को खरमास मानने के कारण, इस महीने में और कोई पर्व या त्योहार नहीं पड़ता। आज के दिन से ही सूर्य का उत्तरायण काल आरंभ होता है, जिससे दिन के परिणाम में वृद्धि होती है और रात घटने लगती है। अब चूंकि सूर्य द्वारा यह राशि परिवर्तन 14 जनवरी को ही होता है, इसलिए मकर संक्रांति प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाई जाती है।
उत्तर भारत के लोग आपसी मेल-मिलाप के इस पर्व को जहां खिचड़ी के नाम से पुकारते हैं, वहीं दक्षिण भारत में इसे पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में गन्ने और चावल बांटे जाते हैं।
इस दिन तुलादान का विशेष महत्व है।
संक्रांति का महत्त्व
मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक, वातावरण में रज-सत्त्व गुणयुक्त तरंगें अधिक मात्रा में कार्यरत होती हैं, इसलिए यह काल साधना हेतु पोषक होता है।
संक्रांति पर तिल का प्रयोग क्यों करते हैं?
तिल में सत्त्व-तरंगें ग्रहण एवं प्रक्षेपित करने की क्षमता अधिक होने के कारण, शरीर में सत्त्व गुण बढ़ता है। तिलयुक्त पानी में नहाने से बाह्यशुद्धि एवं तिल के सेवन से अंतः शुद्धि होती है।
संक्रांति पर उपहार (दान) क्यों देते हैं?
'उपहार देना' यानी दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व के प्रति तन, मन एवं धन के त्याग द्वारा शरण जाना। संक्रांति के काल में किए गए दान के कारण देवता की कृपा होती है एवं जीव को मनोवांछित फल प्राप्ति होती है।
Diese Geschichte stammt aus der January 2026-Ausgabe von Sadhana Path.
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