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कबाली रहस्य

Champak - Hindi

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June First 2025

रघु ने अपने कटोरे से आखिरी इमलीचावल खाया. जब तक रघु को याद है, उस के दिन मायलापुर कबालीश्वर मंदिर से भोजन के साथ समाप्त होते थे. रघु अपनी सुबह स्कूल में बिताता था, जबकि उस की शाम हमेशा मंदिर में बीतती थी. उस की मां वहां फूल बेचती थीं और वह उन की मदद करता था.

- कहानी • सर्वमित्र

कबाली रहस्य

रघु ने लोगों को देख कर बहुत कुछ सीखा. आज शाम उस ने देखा कि एक आदमी और औरत उस की मां की दुकान से और दूसरे फूल बेचने वालों से भी फूल खरीद रहे थे. महिला ने इतना मोलभाव किया कि रघु की मां को कोई लाभ नहीं हुआ. अंत में उस आदमी ने फूलों के पैसे दे दिए, लेकिन रघु ने उसे फुसफुसाते हुए सुना, "अपनी मूर्खतापूर्ण पैसे बचाने की तरकीबों से हमारी योजना को खराब मत करो. यह हमारा बड़ा ब्रेक है." उस के शब्दों में कुछ ऐसा था जो रघु को ठीक नहीं लगा.

जल्द ही अंधेरा छा गया और रघु गौशाला की ओर चल पड़ा, जहां उसे अपनी मां के साथ घर जाने से पहले घास के ढेर पर सोना पसंद था.

खटखट, अचानक आई आवाज ने रघु को चौंका दिया. उस ने इधरउधर देखा और पाया कि मंदिर खाली था. 'मुख्य द्वार भी बंद है. अम्मां मुझे ढूंढ़ रही होंगी,' रघु ने सोचा. लेकिन अच्छा है कि उसे एक छोटा सा छेद पता था, जिस से वह आसानी से निकल सकता था. जब रघु ने धीमी आवाजें सुनीं तो वह छेद की ओर बढ़ा. “हुंहं, इस समय मंदिर में कौन था?” तभी रघु को वह आवाज याद आई जिस ने उसे जगा दिया था. वह उन आवाजों की ओर बढ़ा.

“क्या तुम सावधान नहीं हो सकते? शोर से किसी को सतर्क किया जा सकता था.” एक आदमी अपने साथी को डांट रहा था. चांदनी में रघु ने देखा कि वे कोई भारी चीज ले जा रहे थे. नजदीक से देखने पर रघु को अहसास हुआ कि यह वही जोड़ा था जिसे उस ने पहले अपनी मां की फूलों की दुकान पर देखा था.

“क्या तुम ने सबकुछ पहले जैसा व्यवस्थित कर लिया है?” महिला ने उस आदमी से पूछा.

“हां, हां, मैं ने लैंप को व्यवस्थित कर उस पर पुराने फूल डाल दिए हैं. किसी को पता नहीं चलेगा कि इसे बदल दिया गया है.”

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