पुरुषायुष्य (मनुष्य की आयु)

Jyotish Sagar|March 2020

पुरुषायुष्य (मनुष्य की आयु)
हमारे साहित्य में उल्लिखित है कि 'नरत्वं दुर्लभं लोके' अर्थात् इस जीव लोक में मनुष्य जन्म मिलना बडे सौभाग्य का प्रतिफल है। तुलसी ने भी कहा है ‘बड़े जतन मनुष्य तन पाया।' मनुष्य योनि के अतिरिक्त सभी योनि भोग योनि हैं। भोग योनि में पूर्वजन्म का वर्तमान जन्म के कर्मों का भोग भोगना पड़ता है।
आचार्य लक्ष्मीनारायण शास्त्री व्यास

मनुष्य जीवन ही एक प्रकार ऐसा जीवन है, जिसमें जीवधारी अथवा पूर्व जन्म के कर्म का भोग भोगता हुआ ऐसे कार्य भी कर सकता है, जो उसे 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणं' शृंखला के बन्धन से मुक्त करा सकता है अर्थात् मोक्ष प्राप्ति रूपी परम पुरुषार्थ तक पहुँचा सकता है।

एक जनश्रुति प्रचलित है कि सृष्टि के प्रारम्भ में मनुष्य की आय 40 वर्ष की ही थी। बैल, गधा और कुत्ता इनकी भी आयुष्य 40-40 वर्ष ही थी। इन तीनों ने कहा हमारा जीवन कष्टप्रद है। हम इतना आयुष्य नहीं चाहते हैं, उन्होंने अपना-अपना आधा आयुष्य मनुष्य को दे दिया। परिणामतः 40 वर्ष पर्यन्त तो मनुष्य अपना स्वयं का जीवन जीता है। इसके बाद 40 से 60 तक बैल का जीवन जीता है। बैल की तरह अथक काम करता रहता है। तत्पश्चात् 60 से 80 वर्ष तक गधे का जीवन जीता है। सामर्थ्य नहीं रहते हुए भी बोझा ढोता रहता है। गधे के समान ही उसे कदम-कदम पर तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। जीवन के अन्तिम पड़ाव में उसे 80-100 वर्ष की आयु में कुत्ता-श्वान तुल्य जीवन व्यतीत करना पड़ता है। जैसी रोटी मिल जाए, उसी में सन्तोष करना पड़ता है। कार्य क्षमता तो रहती नहीं है, पराश्रित हो जाता है। दूसरों के दिए हुए अन्न पर जीवनयापन करना पड़ता है। यह कहाँ तक सत्य है, नहीं कहा जा सकता, लेकिन पूर्णतः मिथ्या है, यह भी नहीं कहा जा सकता है।

वेद में कहा गया है कि 'शतायुर्यै भवति पुरुषः' मनुष्य की आयु 100 वर्ष की है। एक अन्य वैदिक ऋचा में कहा गया है 'हे प्रभो हम कानों से शुभ-शुभ सुनते हुए नेत्रों से शुभ-शुभ देखते हुए, हम दृढ़ शरीर वाले होकर देवताओं द्वारा निर्धारित पुरुषापुष्य 100 वर्ष की आयुष्य को प्राप्त करें।'

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा

भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवालं

सस्तनूतभिर्व्यशेमहि देवहितं

यदायुः।।

उदित होते हुए सूर्य को प्रणाम करने की शाश्वत भारतीय परम्परा | है। शास्त्र में कहा गया है उदित होते हुए सूर्य को जो व्यक्ति प्रणाम करते | हैं, उनसे चार प्रकार की उपलब्धि | प्राप्त होती है। प्रथमतः आयुष्य वृद्धि, द्वितीय क्रम में विद्या प्राप्ति, तृतीय क्रम में यशः प्राप्ति और अन्तिम उपलब्धि के रूप में बल की प्राप्ति होती है।

उदयन्तं भास्करं प्रणमन्ति ये

दिने दिने।

चत्वारि वर्धते

तेषामायुर्विद्यायशे बलम्।।

संस्कृत में एक उक्ति प्रचलित है

- आरोग्य भास्करात् विन्देत्

अर्थात् सूर्य से सुस्वास्थ्य प्राप्त करो। यही भाव अंग्रेजी की इस कहावत में भी परिलक्षित होता है “Early to bed and early to rise makes the man healthy, wealthy and wise' जल्दी सोना और जल्दी जागना व्यक्ति को स्वस्थ, धनवान् और बुद्धिमान् बनाता है। प्रातःकाल शीघ्र उठने से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य की जीवनदायिनी रश्मियों का लाभ तो मिलता ही है। वैज्ञानिकों का इस सन्दर्भ में कथन है कि प्रातःकाल सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पर्यन्त तथा सायंकाल सूर्यास्त से डेढ़ घण्टा पूर्व से लेकर सूर्यास्त पर्यन्त तक किरणों का लाभ मिलता है, ये किरणें विटामिन डी का लाभ और अस्थियों को दृढ़ करने का काम करती हैं कई प्रकार से रोगों के उपशमन में भी सहायता होती हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में प्रातः एवं सायंकाल में सन्ध्या- वन्दन को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है।

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