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सर्वसिद्धि-फल प्रदाता पाँच यज्ञ
Jyotish Sagar
|April 2024
पाँच यज्ञ जातक प्रतिदिन कर ले, तो उसके सारे रोग, सन्ताप एवं बुरे कर्म ऐसे नष्ट होने लगते हैं, जैसे अग्नि लकड़ी को जलाकर राख कर देते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं:
न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।
अर्थात् हे अर्जुन! मुझे कोई भी कर्तव्य नहीं है। तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो मुझे प्राप्त नहीं है। फिर भी मैं कर्म और कर्त्तव्य का निर्वहण करता रहता हूँ।
यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कर्म और कर्त्तव्य की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के लिए कर्म कितना महत्त्वपूर्ण है? इस तथ्य को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि यहाँ इस पृथ्वीलोक पर जो भी मनुष्य जन्म लेता है, उसे कर्मचक्र में फँसना ही पड़ता है। पृथ्वीलोक पर निरन्तर कर्म का प्रवाह बना रहता है, लेकिन कर्म का यहाँ प्रभाव इतना बड़ा है कि वही आपका ईश्वर है, वही कर्मा है। आप जितना और जैसा कर्म करते हैं, उसी के अनुपात में कर्मा आपके कर्म को एक रूपरेखा में पिरोता रहता है। यथा कोई कर्म से पाप का रास्ता चुनता है, कोई कर्म से धर्म का रास्ता चुनता है, कोई कर्म से चोरी का रास्ता चुनता है। कर्म से एक भाई अधिकारी बनता है, तो वहीं दूसरा भाई अपने कर्मों से जुआरी भी बनता है, अतः कर्म सर्वोपरि है और कर्तव्य के अनुसार किया गया कर्म सदैव प्रसिद्धि पाने वाला जीवन प्रदान करता है। शुभ और भाग्य भी इसी कर्म को करने से ही उत्पन्न होता है।
This story is from the April 2024 edition of Jyotish Sagar.
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