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कृत्रिम रोशनी की चकाचौंध के खतरे

December 30, 2025

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Jansatta Chandigarh

जिस कृत्रिम रोशनी को हमने अपनी सुविधा के लिए ईजाद किया था, उसके जोखिम अब बढ़ते जा रहे हैं। जरूरत से ज्यादा रोशनी हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा रही है। वैज्ञानिक अध्ययन इस गंभीर खतरे से आगाह कर रहे हैं।

- रंजना मिश्रा

नव सभ्यता के विकास की कहानी में आग के आविष्कार के बाद, बिजली के बल्ब का आविष्कार सबसे क्रांतिकारी माना गया। इसने मनुष्य को अंधेरे पर विजय दिलाई और रात को दिन में बदल कर हमारी कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ा दिया।

हमने शहरों को जगमग कर दिया, घरों को रोशन किया और अपनी रातों को भी दिन की तरह सक्रिय बना लिया। हम इसे विकास और आधुनिकता का नाम देते हैं, लेकिन आज यही विजय हमारी सबसे बड़ी जैविक पराजय का कारण बनती जा रही है। जिस कृत्रिम रोशनी को हमने अपनी सुविधा के लिए ईजाद किया था, वह अब एक ऐसे अदृश्य खतरे में तब्दील हो चुकी है, जो हमारे शरीर के सबसे महत्त्वपूर्ण अंगों खासकर हमारे दिल को अपना शिकार बना रही है।

हालिया वैज्ञानिक अध्ययन हमें जिस गंभीर खतरे से आगाह कर रहे हैं, वह न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि हमारी पूरी आधुनिक जीवनशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। रात का यह अनावश्यक प्रकाश हमारे दिल की सेहत के लिए एक धीमा जहर बन गया है। हममें से अधिकांश लोग इस खतरे से पूरी तरह अनजान हैं। हम रोशनी को सुरक्षा और सकारात्मकता से जोड़ते हैं, जबकि अंधेरे को डर से, लेकिन जीव विज्ञान की दृष्टि से हकीकत इसके ठीक विपरीत है। हाल ही में हुए व्यापक और गहन शोधों ने इस बात की पुष्टि की है कि रात के समय कृत्रिम प्रकाश के संपर्क में रहना केवल हमारी नींद खराब नहीं करता, बल्कि यह हृदय संबंधी जानलेवा बीमारियों का सीधा और प्रमुख कारण बन रहा है। ये अध्ययन उन करोड़ों लोगों के लिए एक चेतावनी है, जो यह मानते हैं कि रात में थोड़ी सी रोशनी, टीवी या फोन का इस्तेमाल नुकसानदेह नहीं है।

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