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भगवान् श्रीकृष्ण के धाम में जन्माष्टमी पर्व
Jyotish Sagar
|August 2025
भगवान् श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आनन्द लेना है, तो मथुरा, वृन्दावन के मुख्य मन्दिरों की झाँकी जरूर देखें। यहाँ का नजारा ही कुछ और होता है।
यहाँ के कुछ मन्दिरों और गोवर्धन-द्वारका में मनाए जाने वाली जन्माष्टमी उत्सव की एकझलक—
श्री बाँकेबिहारी का उत्सव
राजस्थानी कलात्मक पद्धति से निर्मित श्री बाँकेबिहारी मन्दिर वृन्दावन की शान है। सन् 1862 में स्थापित इस मन्दिर में श्री बाँकेबिहारी जी की प्रतिमा को स्थापित करने का श्रेय स्वामी हरिदास जी को जाता है। तीन जगह से टेढ़े और परमानन्द के ठाकुर होने के कारण ही इन्हें बाँकेबिहारी कहा जाता है। इनके श्रीविग्रह (प्रतिमा) के सन्दर्भ में बताया जाता है कि तानसेन के गुरु स्वामी श्री हरिदास जी श्रीकृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे और वृन्दावन के निधिवन में रहकर भक्ति के पद गाया करते थे। वहीं एक दिन स्वामी हरिदास जी को स्वप्न आया और स्वप्नानुसार उन्होंने निधिवन के बताए हुए स्थान पर खुदाई की, तो बाँकेबिहारी जी का श्रीविग्रह प्राप्त हुआ, जिसे बाद में इस स्थान पर स्थापित कर दिया गया।
बाँकेबिहारी मन्दिर में जन्माष्टमी बड़े ही उत्साह और आनन्द के साथ मनाई जाती है। रात को 12:00 बजे भगवान् श्रीकृष्ण जन्म की आहट के साथ ही बिहारी जी का पंचामृत से अभिषेक कराया जाता है। मन्दिर के मुख्य चबूतरे पर व्यास जी द्वारा कृष्ण जन्म की कथा कही जाती है। मंगल आरती करने के बाद ही चारों ओर आनन्द और खुशियों की लहर छा जाती है। सुबह 7:00 बजे से ही नन्दोत्सव प्रारम्भ हो जाता है, जिसमें कृष्ण जन्म-आनन्द में खेल-खिलौने और वस्तुएँ लुटाई जाती है। मटकी फोड़ लीला का आयोजन होता है। यह दृश्य बहुत खूबसूरत होता है।
जयकारों से गूँजती श्रीकृष्ण जन्मभूमिBu hikaye Jyotish Sagar dergisinin August 2025 baskısından alınmıştır.
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