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आद्यगुरु शंकराचार्य
Jyotish Sagar
|May 2025
महादेव के अंशावतार
उस स्त्री की यह बात सुनकर शंकराचार्य गहन चिन्तन में डूब गए और उसी क्षण स्त्री और शव अदृश्य हो गया। शंकराचार्य के समझ में यह तथ्य आ गया कि बिना शक्ति के शिव शव मात्र हैं।
जिस दौरान सनातन धर्म अपने सबसे बुरे समय से गुजर रहा था और उसके प्रमुख सम्प्रदाय अन्य दर्शन की ओर उन्मुख हो रहे थे तथा वे वैदिक ज्ञान को भूल चुके थे, ऐसे समय में भगवान् शिव ने आदिगुरु शंकराचार्य के रूप में जन्म लेकर सनातन धर्म की पुनःस्थापना की। भगवान् शिव ने अपने प्रियभक्त तथा विद्वान् शिवगुरु और विशिष्टा देवी की सन्तान के रूप में जन्म लिया। उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान् शिव की घोर तपस्या की थी, उसी के आशीर्वाद स्वरूप उन्हें यह सन्तान प्राप्त हुई थी। इसलिए उन्होंने इनका नाम भी 'शंकर' ही रखा। यही शंकर आगे चलकर 'आद्यगुरु शंकराचार्य' के नाम से विख्यात हुए।
आद्यगुरु शंकराचार्य का जन्म समय 788 ई. से 820 ई. तक मध्य माना गया है। बालक शंकर ने आयु के प्रथम वर्ष में ही सभी अक्षरों तथा अपनी मातृभाषा को कण्ठस्थ याद कर लिया था। आयु के तृतीय वर्ष में काव्य-पुराणों को सुनने मात्र से ही समझने लगे थे।
जब शंकर मात्र तीन वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहान्त हो गया था। इस गहन दुःख के पश्चात् उनकी माता ने पाँच वर्ष की आयु में उनका उपनयन संस्कार करवाया तथा इसके पश्चात् शंकर विद्याध्ययन के लिए गुरु के पास भेजे गए। दो-तीन वर्ष के अध्ययन से ही शंकर विद्या के सभी भागों में अपने गुरु के समान विद्वान् बन गए।
गुरुजी के आश्रम के नियमों के अनुसार शंकर एक दिन ब्रह्मचारियों के साथ भिक्षा के लिए एक ब्राह्मण के घर भिक्षा लेने पहुँचे। वह ब्राह्मण बहुत ही दरिद्र था, लेकिन उस ब्राह्मण ने भिक्षुक ब्रह्मचारियों को बड़े आदर- सत्कार से मीठे वचन में कहा- "मैं बहुत पुण्यात्मा हूँ, जो आप जैसे महापुरुषों की सेवा का अवसर पाया हूँ, लेकिन भाग्य ने निर्धन बनाकर मुझे इस स्थिति में ला दिया है कि हम एक भिक्षुक को भी भिक्षा देने में असमर्थ हैं, अतः हम लोगों का मानव जीवन धारण करना भी व्यर्थ है।"
Bu hikaye Jyotish Sagar dergisinin May 2025 baskısından alınmıştır.
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