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बारहवाँ भाव : मोक्ष अथवा भोग

Jyotish Sagar

|

December-2024

किसी भी जन्मपत्रिका के चतुर्थ, अष्टम और द्वादश भाव को 'मोक्ष त्रिकोण भाव' कहा जाता है, जिसमें से बारहवाँ भाव 'सर्वोच्च मोक्ष भाव' कहलाता है। लग्न से कोई आत्मा शरीर धारण करके पृथ्वी पर अपना नया जीवन प्रारम्भ करती है तथा बारहवें भाव से वही आत्मा शरीर का त्याग करके इस जीवन के समाप्ति की सूचना देती है अर्थात् इस भाव से ही आत्मा शरीर के बन्धन से मुक्त हो जाती है और अनन्त की ओर अग्रसर हो जाती है।

- डॉ. सुकृति घोष

बारहवाँ भाव : मोक्ष अथवा भोग

तभी तो कहा जाता है कि बारहवें भाव की कोई सीमा नहीं है। मोक्ष की प्राप्ति ही प्रत्येक आत्मा का अन्तिम लक्ष्य होता है। मोक्ष की प्राप्ति को इसी भाव से देखा जाता है।

'मोक्ष' का अर्थ है जीवन मरण के चक्रव्यूह को तोड़कर बाहर निकल जाना अर्थात् निःसीम परमात्मा में विलीन हो जाना। तभी तो इस भाव का अत्यधिक महत्त्व है। इस भाव के कई महत्त्वपूर्ण कारकत्त्व हैं। मोक्ष के साथ-साथ इस भाव से भोग विलास को भी देखा जाता है। यह भाव शय्यासुख का स्थान भी है। भोग-विलास की भी कोई सीमा नहीं होती, क्योंकि भोग की एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा बलवती होने लगती है। यह भाव व्यय का भी भाव है। व्यय भी सीमा रहित होता है। अपने देश की सीमा रेखा लाँघकर विदेश गमन भी इसी भाव से देखा जाता है। साथ ही, अस्पताल, जेल, आश्रम तथा पागलखाना भी इसी भाव से देखे जाते हैं।

जन्मपत्रिका के अन्य सभी भावों से बारहवें भाव को जोड़कर इसके कारकत्त्वों को आसानी से समझा जा सकता है। बारहवें भाव का भावेश विभिन्न भावों में स्थित होकर अलग-अलग परिणाम देता है।

यह भाव लग्न से बारहवाँ है। यह भाव शरीर के व्यय को इंगित करता है, अतः जातक के शरीर की ऊर्जा का व्यय किस प्रकार होगा? यह भाव इसकी जानकारी देता है। जातक के शरीर की ऊर्जा का व्यय मोक्ष प्राप्ति में होगा अथवा भोग-विलास, साधना, विदेश में अथवा कहीं और, यह सब बारहवाँ भाव बता सकता है। यदि बारहवें भाव का भावेश लग्न में स्थित हो जाए, तो वह लग्न का व्यय करवाता है, अर्थात् जातक या तो बहुत मेहनत करता है अथवा उसकी प्रकृति अत्यधिक भोग-विलास की हो सकती है अथवा उसकी रुचि मोक्ष प्राप्ति की ओर हो सकती है। वह या तो सांसारिक चीजों से बहुत अधिक जुड़ाव रख सकता है अथवा संन्यास की ओर अग्रसर हो सकता है।

इसके अलावा जातक विदेश जाने का इच्छुक भी हो सकता है और यह सब ग्रहों की स्थितियों पर निर्भर करता है। यह स्थिति बहुत अच्छी नहीं मानी जाती। जन्मपत्रिका में अगर यह स्थिति बनती है, तो जातक को अपना अहंकार अवश्य ही छोड़ना चाहिए, तभी वह इस स्थिति के कुप्रभावों से बच सकता है।

बारहवाँ भाव द्वितीय भाव का ग्यारहवाँ भाव है अर्थात् यह भाव धन भाव का लाभ भाव कहलाता है। दोनों भाव के इस सम्बन्ध से सीधे तौर पर यह कहा जा सकता है कि धन अधिक चाहिए, तो व्यय को कम करना होगा।

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