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सत्साहित्य के पुरोधा हनुमान प्रसाद पोद्दार
Jyotish Sagar
|September 2024
प्रसिद्ध धार्मिक सचित्र पत्रिका ‘कल्याण’ एवं ‘गीताप्रेस, गोरखपुर के सत्साहित्य से शायद ही कोई हिन्दू अपरिचित होगा। इस सत्साहित्य के प्रचारप्रसार के मुख्य कर्ता-धर्ता थे श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार, जिन्हें 'भाई जी' के नाम से भी सम्बोधित किया जाता रहा है।
भाई जी हनुमान प्रसाद जी पोद्दार का जन्म 17 सितम्बर, 1892 को शिलांग (मेघालय) में हुआ था। इनके पिता का नाम भीमराज था। इनके जन्म के दो वर्ष पश्चात् इनकी माता का निधन हो गया। श्री हनुमान प्रसाद का पालन-पोषण उनकी दादी रामकौर देवी ने किया। दादी ने ही उन्हें हनुमान कवच का पाठ सिखाया और वैष्णव धर्म की शिक्षा प्रदान की। एक मारवाड़ी पाठशाला में इनकी शिक्षा-दीक्षा सम्पन्न हुई। पिता की कलकत्ता (अब कोलकाता, प. बंगाल) में दुकान थी । प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कर ये कलकत्ता आ गए और पिता के कार्य में सहायता करने लगे। प्रारम्भ से ही इनकी रुचि धार्मिक कार्यों और परोपकार में थी। उस समय देश में अंग्रेजों का राज्य था। देशभक्ति की भावना इनमें कूट-कूटकर भरी थी। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर इन्होंने मोटी खादी की धोती और चादर धारण करना प्रारम्भ कर दिया।
सन् 1911 में हनुमान प्रसाद जी सेठ श्री जयदयाल जी गोयन्दका के सम्पर्क में आए। उन्हीं दिनों इनके पिता का देहावसान हो गया और पोद्दार जी अपने पिता के व्यवसाय को भी पूरे तरीके से सँभालने लगे और साथ ही धर्मचर्चा में भी रुचि लेने लगे। सेठ जयदयाल जी के आदेश से गीता और रामायण पर प्रवचन देने लगे। साथ ही स्वामी रामसुखदास जी का भी सान्निध्य इन्हें मिला। स्वामी रामसुखदास जी गीता पर बड़ा सारगर्भित प्रवचन देते थे। उनकी रचित पुस्तक 'गीता तत्त्व विवेचनी' काफी लोकप्रिय हुई।
पोद्धार जी ने आगे चलकर देश के आजादी के आन्दोलन में भी भाग लिया। बंगाल के क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आए। सुभाष चन्द्र बोस, विपिनचन्द्र पाल, अरविन्द घोष आदि के साथ गोपाल कृष्ण गोखले, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गाँधी जैसे स्वतन्त्रता सेनानियों के भी सम्पर्क में आए। अंग्रेज सरकार ने इन्हें राजद्रोह के अपराध में बन्दी भी बनाया।
Bu hikaye Jyotish Sagar dergisinin September 2024 baskısından alınmıştır.
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