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सत्य एवं अहिंसा के अग्रदूत महात्मा गाँधी
Jyotish Sagar
|October-2023
2 अक्टूबर, 1869 ई. को अवतरित हुए महान् स्वतंत्रता सेनानी, अहिंसा तथा सत्याग्रह के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान था। बापू के इस योगदान के लिए समस्त देश गर्वानुभव करता है और उन्हें बिना याद किए नहीं रह सकता है।
हालाँकि इस पुनीत धरा को अंग्रेजों के गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए भारत माँ के अनेक वीर सैनिकों ने हिंसा के पथ को अख्तियार किया। उस वक्त राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अहिंसा एवं सत्याग्रह को अस्त्र बनाकर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के लिए कूद पड़े। गाँधीजी एक मात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने समस्त राष्ट्र में अहिंसा तथा सत्याग्रह के मशाल और अलख जगाई तथा देश की आजादी में सफलता प्राप्त की।
अहिंसा और सत्याग्रह के हिमायती महात्मा गाँधी कहते थे कि 'यदि मैं राजनीति में भाग लेता हूँ, तो मात्र इसलिए कि राजनीति हमें साँप की कुण्डली की भाँति चारों ओर घेरे हुए है। हम प्रयास करके भी उसके घेरे से बाहर नहीं आ सकते। इसलिए मैं साँप से लड़ना चाहता हूँ।' गाँधीजी राजनीति को सत्य एवं अहिंसा के आधार पर लड़ना चाहते थे।
बापू के मतानुसार, 'अहिंसा (किसी को हानि नहीं पहुँचाना) का आशय है असीम प्रेम। मात्र इसी के द्वारा ही मानव जाति को बचाया जा सकता है। अहिंसा वीरों का अस्त्र है। अहिंसा का पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी अंग्रेज को मन, कर्म तथा वाणी से हानि नहीं पहुँचाना चाहता।
Bu hikaye Jyotish Sagar dergisinin October-2023 baskısından alınmıştır.
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