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अरावली पर्वत श्रृंखला : भविष्य की आखिरी दीवार
Dakshin Bharat Rashtramat Bengaluru
|December 23, 2025
ज ब पृथ्वी ने अपने विकास की पहली लंबी साँस ली होगी, जब महाद्वीपों का आकार तय हो रहा होगा और जीवन की संभावना धीरे-धीरे आकार ले रही होगी, तब अरावली पर्वतमाला धरती की देह पर एक स्थिर, धैर्यवान और मौन संरक्षक के रूप में उभरी।
लगभग दो सौ करोड़ वर्ष पुरानी यह पर्वत शृंखला केवल भूगर्भीय संरचना नहीं, बल्कि पृथ्वी के इतिहास की जीवित स्मृति है। यह वह साक्षी है जिसने जीवन के उद्धव को देखा, जलवायु के अनगिनत उतार-चढ़ाव सहे और मनुष्य के आगमन से बहुत पहले प्राकृतिक संतुलन की रक्षा का भार अपने कंधों पर लिया। अरावली हमें यह सिखाती है कि प्रकृति की महानता उसकी ऊँचाई या चमक से नहीं, बल्कि उसकी भूमिका, धैर्य और निरंतरता से मापी जाती है।
अरावली सदियों से राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक कवच बनी हुई है। यह पर्वतमाला थार रेगिस्तान और शेष उपजाऊ भारत के बीच एक अदृश्य दीवार की तरह खड़ी रही है। इसकी चट्टानें और पहाड़ियाँ तेज़ हवाओं की गति को रोकती हैं, धूल और रेत को आगे बढ़ने से थामती हैं और इस प्रकार रेगिस्तान को बेकाबू फैलने से रोकती हैं। यदि आज भी राजस्थान पूरी तरह रेगिस्तान में नहीं बदला है, यदि हरियाणा और दिल्ली अब तक पूर्ण मरुस्थलीकरण से बचे हैं, तो इसके पीछे अरावली का मौन योगदान है। यह योगदान इतना स्वाभाविक रहा कि मनुष्य ने इसे कभी महसूस ही नहीं किया, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी त्रासदी है।
जल संरक्षण के क्षेत्र में अरावली की भूमिका किसी वरदान से कम नहीं रही। इसकी प्राचीन चट्टानें वर्षा जल को रोककर धीरे-धीरे धरती के गर्भ में समाहित करती हैं। यही जल भूजल बनकर कुओं, बावड़ियों, झीलों और नदियों को जीवन देता है। अरावली को सही अर्थों में वॉटर रिचार्ज ज़ोन कहा जा सकता है। जब मानसून की बारिश तेज़ होती है, तब यह पर्वतमाला जल की गति को नियंत्रित करती है, बाढ़ की विभीषिका को कम करती है और पानी को बह जाने के बजाय संचित होने का अवसर देती है। यदि यह संरचना टूटती है, तो पानी केवल कुछ घंटों में बहकर नष्ट हो जाएगा, और धरती के नीचे का जल भंडार धीरे-धीरे खाली हो जाएगा। यही कारण है कि आज दिल्ली-एनसीआर और
आसपास के क्षेत्रों में बढ़ते जल संकट की जड़ें कहीं न कहीं अरावली के क्षरण से जुड़ी हैं।
Bu hikaye Dakshin Bharat Rashtramat Bengaluru dergisinin December 23, 2025 baskısından alınmıştır.
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