कार्बी आंगलोंग के लोगों का डर
Aaj Samaaj
|December 27, 2025
तमाम आधुनिकता के बावजूद लोगों में अब भी जड़ से जुड़े रहने की ललक दिखाई दे रही है।
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असम के कार्बी आंगलोंग के लोगों को इसी बात का डर सता रहा है कि कहीं उन्हें बाहरी लोग बेदखल न कर दें।बेदखल संस्कृति, सभ्यता और परंपरा से। आरोप है कि गैर-आदिवासी लोगों के दशकों से कथित कब्जे के कारण वे अपने जमीन पर जनसांख्यिकी, राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण खो रहे हैं। हाल ही में हुई हिंसा का तात्कालिक कारण विलेज ग्रेजिंग रिजर्व (वीजीआर) और प्रोफेशनल ग्रेजिंग रिजर्व (पीजीआर) की जमीन से कथित कब्जा करने वालों को हटाने की लंबे समय से चली आ रही मांग थी। ये इलाके असल में जानवरों के चरने के लिए तय थे और आदिवासियों की रोजी-रोटी के लिए कानूनी तौर पर सुरक्षित थे। कहा जा रहा है कि 7184 एकड़ से ज्यादा जमीन पर गैर-आदिवासी (बिहार-यूपी के लोग) ने गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर लिया है, जो छठी अनुसूची वाले इलाकों में लागू आदिवासी जमीन सुरक्षा कानूनों का उल्लंघन है। कार्बी आंगलोंग और पश्चिम कार्बी आंगलोंग के मूल निवासी अपने जमीन के अधिकारों की सुरक्षा की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। सबसे ज्यादा अशांति पश्चिम कार्बी आंगलोंग में है। सुरक्षित आदिवासी जमीन पर कथित कब्जे के खिलाफ शुरू हुआ शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसक रूप ले लिया। इसमें दो लोगों की मौत हो गई। एक पुलिस की गोली लगने से और दूसरा जिंदा जल गया। हिंसक प्रदर्शनकारियों ने कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद (केएएसी) के मुख्य कार्यकारी सदस्य (सीईएम) तुलीराम रोंगहांग के घर में आग लगा दी और खेरोनी में एक बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स में आगजनी की गई। बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए, असम सरकार ने कार्बी आंगलोंग पहाड़ी इलाके में निषेधाज्ञा लगा दी और इंटरनेट सर्विस को अनिश्चित समय के लिए रोक दिया। बताते हैं कि कार्बी आंगलोंग छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त पहाड़ी जिला है, जिसे स्थानीय जनजातियों की जमीन, संस्कृति और पहचान की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद को औपचारिक रूप से 1952 में बनाया गया था, जिससे यह असम की पहली पूरी तरह से ऑटोनॉमस काउंसिल बन गई। 1951 के बाद कार्बी आंगलोंग में बसे लोगों को जमीन के मालिकाना हक नहीं मिलते। हालांकि, पहाड़ों में प्रवास दशकों तक जारी रहा, जिसकी शुरूआत एंग्लो-कुकी युद्ध (1917-1919) के बाद बेघर हुए कुकी लोगों के बसने से हुई और 1960 के दशक से बिहार और यूपी से खेती करने वाले लोग
Bu hikaye Aaj Samaaj dergisinin December 27, 2025 baskısından alınmıştır.
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