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खिलाड़ी नहीं, ब्रांड कहिए हुजूर!

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May 12, 2025

खेल मैदान तक सीमित नहीं रहा, अब ब्रांडों की स्पॉन्सरशिप और सोशल मीडिया से भी आगे पैसा उगाने की फटाफट मशीन बन चुकी है

- मंथन रस्तोगी

खिलाड़ी नहीं, ब्रांड कहिए हुजूर!

ब खेल सिर्फ मैदान पर नहीं खेले जाते । खिलाड़ी अब मैदान से बाहर भी चमक रहे हैं- कभी विज्ञापन, कभी सोशल मीडिया में, तो कभी करोड़ों की लीग में । जिस तेजी से खेल बदला है, उतनी ही तेजी से बदली है खिलाड़ियों की पहचान और कमाई की कहानी। पहले खिलाड़ी केवल खेल के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब वे सेलिब्रिटी हैं। पहले उनके लिए केवल नौकरी और पुरस्कार ही आय का स्रोत थे, अब विज्ञापन और लीग प्रमुख हैं। पहले खेल स्थानीय था, अब यह वैश्विक उद्योग बन चुका है। इसमें सबसे बड़ा योगदान उनके चाहने वालों का है। पहले प्रशंसक सीमित थे, अब सोशल मीडिया ने उन्हें विस्तार दिया है। पिछले कुछ दशकों में खेल उद्योग नाटकीय रूप से बदला है। अब इसमें मार्केटिंग, ब्रांड वैल्यू, खिलाड़ियों की आय के स्रोत जैसे पहलू भी शामिल हैं। आज के दौर में भारतीय खिलाड़ी जैसे विराट कोहली, एमएस धोनी और नीरज चोपड़ा न केवल अपने खेल के लिए, बल्कि ब्रांड वैल्यू और कमाई के लिए भी चर्चित हैं। अब आइपीएल में नए-नए खिलाड़ियों की आमद की चर्चाएं भी उनकी अचानक कमाई और गरीबी से अमीरी की दास्तान बन गई है।

यकीनन हमारे देश में अस्सी के दशक तक खेल की दुनिया मैदान तक सीमित थी। क्रिकेट, हॉकी और कुश्ती जैसे खेल लोकप्रिय थे, लेकिन उनका व्यावसायिक पहलू सीमित था। तब क्रिकेट की चर्चाएं भी शहरी और अभिजात वर्ग तक ही सीमित थीं। हॉकी बच्चे-बच्चे तक में लोकप्रिय थी। कुश्ती, फुटबॉल के सितारों की चर्चा खूब होती थी। लेकिन खिलाड़ियों की कमाई की चर्चाएं विरले ही होती थीं और उनके निजी जीवन की बातें भी न के बराबर थीं । चर्चाएं सिर्फ उनकी खेल महारत तक ही केंद्रीत थीं।

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