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श्रमयोगियों के पसीने से महकता लोकतंत्र
Open Eye News
|May 2023
देश को कल उसकी नई संसद की शानदार इमारत मिलने जा रही है। सैकड़ों अनाम मजदूरों के दिन-रात के श्रम से खड़ी हुई है यह। इसका निर्माण कार्य तब भी जारी रहा था जब कोरोना की दूसरी लहर से त्राहि-त्राहि मची हुई थी। इसे तामील करने में आधुनिक मशीनों का भी खासा योगदान रहा। जबकि जिस संसद भवन (पहले काउंसिल हाउस) का 1927 में उद्घाटन किया गया था उसे खड़ा करने में मजदूरों का सिर्फ श्रम लगा था। उन्होंने धौलपुर से लाये गये भारी पत्थरों को हाथों से उठाउठाकर संसद को बनाया था।
बहरहाल, नई संसद को बनाने में मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा और कुछ बिहारी मजदूरों ने पसीना बहाया। ये सब ठेकेदार के मुलाजिम थे और संसद भवन का काम पूरा होने के बाद प्रगति मैदान और मिंटो रोड में चल रहे दूसरे केन्द्र सरकार के निर्माण कामों से जुड़ गए हैं। इनमें से कुछ बिजली और कुछ पलम्बर का काम भी सही से जानते हैं। इन्हें यहां 8 घंटों की शिफ्टों में काम करना पड़ा था। हर महीने 15 हजार रुपये पगार और दोनों वक्त का भोजन। इसके अलावा मेडिकल सुविधा भी। ओवर टाइम भी मिलता रहा। राजधानी में सेंट्रल विस्टा और अन्य परियोजनाओं को पूरा करने के लिए हजारों मजदूर यहां आए हुए हैं। ये सब वापस तो अपने गृह प्रदेशों में जाने वाले नहीं हैं। ये एक प्रोजेक्ट के खत्म होने के बाद अगले प्रोजेक्ट से जुड़ जाते हैं। दिल्ली के पुराने लोगों को याद होगा कि यहां पर 1982 के एशियाई खेलों के समय बहुत बड़ी तादाद में मजदूर आए थे। तब मजदूर बिहार से काफी तादाद में आते थे। अब बिहार से आने वाले मजदूरों की संख्या निश्चित रूप से बहुत घटी है। जब संसद भवन का निर्माण चल रहा था तब शाम के पांच बजे ये श्रमिक चाय पीने के लिए संसद भवन परिसर से बाहर आ जाया करते थे। ये बाहर किसी चाय के ठीये में खड़े होकर चाय पीते हुए मिलते थे। कुछ मोबाइल पर अपने घरों में बतिया भी रहे होते थे। इनके सिरों पर हेल्मेट होते थे। अब इस तरह का नजारा आपको प्रगति भवन के बाहर देखने को म
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