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वीर बालक एकनाथ
Kendra Bharati - केन्द्र भारती
|December 2022
“मैं जो चाहता हूँ, वह है लोहे की मांसपेशियाँ और फौलाद की स्नायु (नसें), जिनके भीतर ऐसा मन वास करता हो जो कि वज्र के समान पदार्थ का बना हो। बल, पुरुषार्थ, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज ।” स्वामी विवेकानन्द की भारत के युवाओं से यही अपेक्षा थी। वे कहते थे, “बल ही जीवन है; दुर्बलता ही मृत्यु”। विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक माननीय श्री एकनाथजी रानडे का जीवन स्वामीजी के इस सन्देश का प्रकटीकरण है। बाल्यकाल से ही एकनाथजी के जीवन में 'लोहे की मांसपेशियाँ, फौलाद की नसें तथा वज्र समान मन' का दर्शन होता है। बचपन में उनको 'नाथ' कहकर बुलाया जाता था।
नाथ श्री रामचन्द्र रानडे तथा श्रीमती रमाबाई के आठवें पुत्र थे। श्री रामचन्द्र रानडे रेलवे में काम करते थे इसलिए परिवार को लेकर उनको भिन्न-भिन्न नगरों में रहना पड़ा। जब नाथ का जन्म हुआ, वे टिमटाला नामक छोटे से गांव में रहते थे। वर्ष १६२१ में नाथ को अपने बड़े भैया के पास नागपुर भेजा गया। तब नाथ दूसरी कक्षा में पढ़ता था।
नाथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'कुश पथक' का स्वयंसेवक था । नियमित रूप में शाखा जाया करता था। खेल, व्यायाम आदि में उसकी विशेष रूचि थी । कबड्डी का खेल तो उसे बहुत अच्छा लगता था। खेल में नाथ जिस चमू में होता था वे बच्चे खुश रहते थे क्योंकि नाथ एकसाथ ४/५ बच्चों को अपने साथ खींचकर लाता था और दूसरी चमू के अधिकतर खिलाड़ी आउट हो जाते थे। बालपन से ही नाथ बलवान और निडर था।
This story is from the December 2022 edition of Kendra Bharati - केन्द्र भारती.
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