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गंगोत्पत्ति का पावन दिवस है गंगा दशहरा

Jyotish Sagar

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June 2025

देवकुल की होने के कारण गंगा को ‘सुरसरि' भी कहा जाता है। भगवान् विष्णु चरणों से उत्पत्ति के कारण गंगा को 'विष्णुपदी' कहा गया। भगीरथ के प्रयासों से प्रवाहित होने के कारण गंगा को ‘भागीरथी' कहा गया। जान्हु ऋषि की कृपा से प्रवाहित होने के कारण इसका 'जान्हवी' नाम पड़ा।

- डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

गंगोत्पत्ति का पावन दिवस है गंगा दशहरा

गंगा दशहरा पुण्य सलिला माँ गंगा का हिमालय से उत्पत्ति दिवस है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान से दस प्रकार के पापों का विनाश होता है। इसलिए इस दिन को पुराणों में 'गंगा दशहरा' नाम दिया गया है। पापों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है-

1. कायिक पाप :

बिना दिए किसी की वस्तु लेना, यज्ञादि विधान के बिना हिंसा, परनारी गमन कायिक पाप कहलाते हैं।

2. वाचिक पाप :

कठोर वचन बोलना, असत्य वचन बोलना, दूसरों की चुगली अथवा परनिंदा करना, असम्बद्ध प्रलाप करना वाचिक पाप कहलाते हैं।

3. मानसिक पाप :

पराई धन-सम्पत्ति हड़पने की कामना, दूसरों को हानि पहुँचाने की चिन्ता, व्यर्थ की बातों पर दुराग्रह करना मानसिक पाप कहलाते हैं। माँ गंगा की उत्पत्ति के विषय में दो कथाएँ प्रचलित हैं-

प्रथम : गंगा की उत्पत्ति भगवान् विष्णु के चरणों से हुई थी। पितामह ब्रह्मा ने उसे अपने कमण्डलु में गंगा को भर लिया था। ऐसी प्रसिद्धि है कि विराट् (वामन) अवतार के आकाश स्थित तीसरे चरण को धोकर ब्रह्मा ने गंगा को अपने कमण्डलु में रख लिया था। (ध्रुव नक्षत्र स्थान को पौराणिक गण विष्णु का तीसरा चरण मानते हैं। वहीं मेघ नक्षत्र होते हैं और वृष्टि करते है। वृष्टि से ही गंगा की उत्पत्ति होती है।)

द्वितीय : द्वितीय धारणा है कि गंगा का जन्म हिमालय की पुत्री के रूप में सुमेरू तनया अथवा मैना के गर्भ में हुआ था।

पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर गंगा अवतरण की कथा इस प्रकार है-

कपिल मुनि के शाप से राजा सगर के 60,000 पुत्र भस्म हो गए। उनके उद्धार के लिए उनके वंशजों ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए घोर तपस्या की। अन्त में भगीरथ की घोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर ले जाने की अनुमति दे दी, लेकिन पृथ्वी ब्रह्मलोक से अवतरित होने वाली गंगा के तीव्र वेग को सहन करने में असमर्थ थीं, अतः भगीरथ ने महादेवजी से गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी के कमण्डलु से निकलकर गंगा माँ भगवान् शिव की जटाओं में रुक गयीं और वहाँ से पुनः मृत्युलोक की ओर चलीं।

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