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केमद्रुमयोग
Jyotish Sagar
|June 2025
यहीं से हमें केमद्रुमयोग और केमद्रुमभंग योग दो योग देखने को मिलते हैं। चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में पंचताराग्रहों में से कोई ग्रह न हो, तो केमद्रुम योग होता है, परन्तु कुछ परिस्थितियों में केमद्रुमयोग भंग भी हो जाता है।
ज्योतिष में चन्द्रमा और पंचतारा ग्रहों (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) से निर्मित चार प्रकार के योग प्रसिद्ध हैं। चन्द्रमा से द्वितीय भाव में पंचतारा ग्रह स्थित हो, तो सुनफा योग, द्वादश भाव में इनमें से कोई ग्रह स्थित हो, तो अनफा योग, द्वादश और द्वितीय भाव दोनों में ही कोई पंचताराग्रह स्थित हो, तो दुरुधरा योग तथा दोनों भावों (द्वितीय और द्वादश) में कोई पंचताराग्रह स्थित न हो, तो केमद्रुम योग बनता है। पहले तीन योग शुभयोग और केमद्रुम योग अशुभ योग है। प्रस्तुत आलेख में केमद्रुम योग पर विस्तृत चर्चा की जा रही है।
सुनफादि चारों योग चन्द्रकृत योग हैं और यूनानी ज्योतिष से ग्रहण किए गए हैं। 'केमद्रुम' शब्द यूनानी भाषा के शब्द 'केनोड्रोमिआ' κενοδρομία (kenodromia) का संस्कृत संस्करण है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय ज्योतिष में यह योग दो यूनानी स्रोतों से लिया गया है, जो अलग-अलग परिभाषाओं के रूप में दिखाई देते हैं। पहला स्रोत है स्फुजिध्वज कृत यवनजातक और दूसरे स्रोत पर आधारित श्रुतकीर्ति और विद्वानों का मत है। प्रथम मत का प्रचलन अधिक है, द्वितीय मत कुछेक स्थानों पर ही दृष्टिगोचर होता है। यवनजातक में कहा गया है कि पंचतारा ग्रहों में से कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में स्थित न हो, उससे युत न हो, केन्द्र भाव में कोई ग्रह न हो तथा चन्द्रमा पर किसी ग्रह की दृष्टि भी न हो, तो केमद्रुम योग होता है -
चन्द्रात् कुटुम्बोपगते ग्रहे तु योगाग्रहास्ते सुनफां वदन्ति। चन्द्रप्रमुक्ते ऽनफरेति योगं तथोभयोर्दौरुधुरं वदन्ति।। चन्द्रे तु योगा यदि न स्युरेते चतुष्टयं च ग्रहवर्जितं स्यात्। केमद्रुमेत्यन्त्यफलस्य योगः सर्वग्रहावेक्षणविप्रयुक्तः।।
- यवनजातक, 10/1-2
स्फुजिध्वज की इस परिभाषा के अनुसार केमद्रुम योग के निर्माण के लिए निम्नलिखित शर्तें आवश्यक हैं :
1. जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जिस भाव में स्थित है, उससे अगले (द्वितीय) एवं पिछले (द्वादश) भाव में मंगलादि पाँच तारा ग्रहों में से कोई भी ग्रह स्थित नहीं होना चाहिए। इस प्रकार सुनफा, अनफा एवं दुरुधरा योग का अभाव होना चाहिए।
This story is from the June 2025 edition of Jyotish Sagar.
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