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लोककल्याणकारी देवता शिव
Jyotish Sagar
|February 2025
देवाधिदेव शिव लोककल्याणकारी देवता हैं। शिव अनादि एवं अनन्त हैं। शिव शक्ति का ही आदिरूप त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश में शिव को जहाँ संहार देवता माना है, वहाँ उनका आशुतोष रूप है अर्थात् शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव।
भारतीय संस्कृति में शिव के अनेक रूप देखने में आते हैं। भारत के लोकजीवन में शिव ऐसे छा गए हैं, कि कोई भी हिन्दू हो, किसी जाति अथवा सम्प्रदाय का हो, वह भगवान् महादेव में श्रद्धा अवश्य रखता है।
लोक साहित्य, लोकगीत एवं लोककला में भी शिव समाहित हैं। आदिवासी एवं निम्न हिन्द जाति के समाज में भी शिव अधिक पूजे जाते हैं। कारण यह है कि उनकी पूजा-आराधना सादगीपूर्ण है, बिना अधिक व्यय किए। बिल्वपत्र, धतूरा आदि सस्ती वस्तुओं से ही उनकी पूजा की जाती है। शिवमन्त्र भी सामान्य जनता द्वारा सरलता से बोले जा सकते हैं। यथा 'ॐ नमः शिवाय', 'ॐ रुद्राय नमः' आदि। शिव की पूजा प्राचीन काल से प्रचलित है। शिव आर्य एवं द्रविड़ सभ्यता दोनों में समान रूप से पूजे जाते हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों में कई प्रकार की शिव मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
शिव को पशुपति भी कहा जाता है अर्थात् पशुओं में भी लोकप्रिय | शिव का वाहन नन्दी (बैल) है, तो उनका आभूषण नाग (सर्प) है। सिन्धु घाटी के भग्नावेश में जो हड़प्पा से मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, उसमें वे पद्मासन अवस्था हैं और चार पशुओं हाथी, शेर, गेंड़ा एवं भैंसा से घिरे हुए हैं। शिव के इसी सादगीमय कल्याणकारी स्वरूप ने शिव भक्तों के हृदय में अपना स्थान बनाया है। वे संहारक हैं, तो जीवनदाता भी हैं। शिव का एक नाम 'हर' भी है अर्थात् पापों को हरने वाले देवता, दीन-दुखियों के कष्ट को दूर करने वाले भगवान्। वे देवता एवं मानव में जितने आराध्यमय रहे हैं, उतने दैत्य दानवों में भी।
This story is from the February 2025 edition of Jyotish Sagar.
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