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भाग्यचक्र बिगाड़ता चला गया सारे जीवन का क्रम
Jyotish Sagar
|January 2025
आलेख के आरम्भ में हम ज्ञान, विद्या और कर्म के आकलन पर विचार कर लेते हैं। जब मनुष्य आयु में बड़ा होने लगता है, जब वह बूढ़ा अर्थात् बुजुर्ग हो जाता है, क्या तब वह ज्ञानी हो जाता है? क्या बड़ी डिग्रियाँ लेकर ज्ञानी हुआ जा सकता है? मैं ज्ञानवृद्ध होने की बात कर रहा हूँ। यानी तन से वृद्ध नहीं, जो ज्ञान से वृद्ध हो, उसकी बात कर रहा है।
वास्तव में ज्ञानवृद्ध ही सच्चा ज्ञानी है. विद्वान है जबकि तन से वृद्ध पाखण्डी हो सकता है अथवा महज उसने अपनी आयु को पशु के समान ही भोग किया है। यथा जब राजा जनक के दरबार में अष्टावक्र को एक दरबारी द्वारा रोका जाता है, तब अष्टावक्र उस द्वारपाल से कहते हैं "आग की एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे जंगल को जलाकर खाक कर देती है।
बाल पकने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता और न ही धनाढ्य और कुलीन होने से कोई बड़ा। ज्ञान की साधना करने वृद्ध और महत्त्वपूर्ण होता है। मैं ज्ञानवृद्ध हूँ। इसलिए मुझे अन्दर जाने दो और आचार्य बन्दी से शास्त्रार्थ करने दो।” यानी यहाँ दर्शनशास्त्र में दो तरह के वृद्ध कहे गए हैं - एक ज्ञानवृद्ध और एक शरीर वृद्ध अर्थात् आयु वृद्ध।
अब विद्या की बात करते हैं। वह जो हमें सारी भ्रान्तियों, पीड़ाओं, शुभ आदि से मुक्ति दिलाए, वह विद्या है। जो हमें द्वैत के भाव से, हम दो के विचार से अलगाव के विचार से, तुम और मैं के भेद से मुक्ति दिलाए, वह विद्या है। विद्या दृष्टि देती है, जिससे मनुष्य अपने ब्रह्मरूप को पहचान सके। विष्णुपुराण के (1-19-41) श्लोक में कहा गया है-
तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये।
This story is from the January 2025 edition of Jyotish Sagar.
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