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गोचराष्टक वर्ग से शनि के गोचर का अध्ययन

Jyotish Sagar

|

June 2024

यदि ग्रह गोचराष्टक वर्ग में 4 या अधिक रेखाओं वाली राशि पर गोचर कर रहा है, तो जिन-जिन कक्षाओं में उस राशि को शुभ रेखाएँ प्राप्त हुई हैं, उन कक्षाओं के स्वामी ग्रह के जन्मपत्रिका में भावों और नैसर्गिक कारकत्वों से सम्बन्धित शुभफलों की प्राप्ति होती है।

गोचराष्टक वर्ग से शनि के गोचर का अध्ययन

[ साढ़ेसाती और ढैया के विशेष सन्दर्भ में ]

'ल' ष्टकवर्ग 'निश्चयात्मक ज्योतिषशास्त्र' है। महर्षि पराशर की मान्यता है कि “मनुष्यों की आयु का ज्ञान और जीवन में आने वाले सुख-दुःख का ज्ञान ही ज्योतिष का प्रयोजन है, लेकिन बृहस्पति या वसिष्ठ भी जब स्वयं निश्चय से फलकथन नहीं कर सकते, तब सामान्य मनुष्यों की क्या सामर्थ्य है।” इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए बृहत्पाराशरहोराशास्त्र में 'अष्टकवर्ग पद्धति' का प्रतिपादन किया गया और इसे 'विशेष ज्योतिषशास्त्र' की संज्ञा दी गई। अष्टकवर्ग के महत्त्व को रेखांकित करते हुए जातकपारिजात के लेखक वैद्यनाथ लिखते हैं कि "कुण्डली में ग्रह चाहे अपने घर में हो, उच्च में हो, मित्रों के वर्ग में हो, चाहे केन्द्रबल हो या अन्य किसी प्रकार का बल हो, यदि वह ऐसी राशि में जाता है, जिसमें उसे शुभ रेखाएँ कम प्राप्त होती हैं, तो ऐसा ग्रह अनिष्टफल देता है।"

इसके विपरीत “चाहे ग्रह दष्ट स्थान में स्थित हो, नीचराशि में हो, शत्रुराशि में हो, शत्रुओं के वर्ग में हो, किन्तु वह अष्टकवर्ग में अधिक शुभ रेखाओं से त राशि में स्थित हो, तो शुभफल प्रदान करता है।” इस प्रकार होरामकरन्द में गुणाकर लिखते हैं" ग्रहों का गोचरफल एक राशि वाले मनुष्यों को एक जैसा मिलकर भिन्न-भिन्न प्राप्त होता है। सूर्यादि सप्तग्रह एवं लग्न के अष्टकवर्ग से जातक के जीवन में आने शुभाशुभ फलों का सूक्ष्म ज्ञान होता है।"

अष्टकवर्ग पद्धति के अन्तर्गत ग्रहों के बलाबल और उनकी शुभाशुभता का ज्ञान उनके भिन्नाष्टक वर्गों से तथा भावों के शुभाशुभ फलों का ज्ञान सर्वाष्टक वर्ग से किया जाता है। इसी प्रकार गोचरफल सूक्ष्म ज्ञान गोष्टकवर्ग से किया जाता है।

जैसाकि विदित है, गोचराष्टक वर्ग में एक राशि को आठ कक्षाओं में विभक्त किया जाता है और प्रत्येक कक्षा का विस्तार 03 अंश 45 कला होता है। ये आठ कक्षाएँ क्रमश: शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्रमा और लग्न की होती है। राशि का इस प्रकार से कक्षाओं में विभाजन को अष्टकवर्ग में 'कक्षा सिद्धान्त' के नाम से जाना जाता है। ये कक्षाएँ इस प्रकार हैं :

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