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होलिका दहन का शास्त्रीय विधान
Jyotish Sagar
|March 2024
गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है अर्जुन! जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, अग्नि के अर्पण करते हो, दान देते हो, तपस्या करते हो, उसे मेरे अर्पण करते हुए करो।
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रंगों का पर्व होली अपना विशिष्ट स्थान रखती है। जिस प्रकार प्रकाश पर्व दीपावली शीत ऋतु के प्रारम्भ की संसूचक है, उसी प्रकार होलिका ग्रीष्म ऋतु के आगमन की परिचायक है। ऋतुराज बसन्त का प्राकट्य भी इस श्रृंखला की प्रथम कड़ी है। विविध वर्ण से शृंगार की हुई प्रकृति मानव मन को भाव विभोर कर देती है। वह प्रकृति की रंगों से रंग जाता है। रंगों से खेलना इस ऋतु का चरमोत्कर्ष है। वर्षभर के कटु-मधुर सम्बन्धों से परे होकर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से गले मिलता है। एक-दूसरे को रंग डालकर अतीत को भूलाकर भविष्य की सुखानुभूति के लिए आशान्वित होता है। होलिका दहन रंगोत्सव की यौवनावस्था है। होलिका दहन के साथ-साथ रंग खेलने का शुभारम्भ हो जाता है।
होलिका दहन एक शास्त्रीय विधि है। ज्योतिष की दृष्टि से होलिका दहन शासक और शासित दोनों को प्रभावित करता है। प्रतिपदा, चतुर्दशी में दिन के समय और भद्रा के समय होलिका दहन करना अनिष्टकारक है। यह सम्पूर्ण राष्ट्र को हानिकारक है।
प्रतिपद्भूतभद्रासु यार्चिता होलिका दिवा।
संवत्सरं तु तद्राष्ट्रं पुरं दहति साद्भुतम् ॥
This story is from the March 2024 edition of Jyotish Sagar.
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