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विशेष सिद्धिदायक हैं शक्तिपीठ
Jyotish Sagar
|October-2023
हृदय से ऊर्ध्व भाग के अंग जहाँ गिरे, वहाँ वैदिक और दक्षिण मार्ग की सिद्धि होती है और हृदय से निम्न भाग के अंग जहाँ गिरे, वहाँ वाममार्ग की सिद्धि होती है।
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शक्तिपीठों के सम्बन्ध में पौराणिक कथा है कि जब दक्ष प्रजापति ने 'बृहस्पति सव' नामक यज्ञ करवाया और उसमें भगवान् शिव के अलावा सभी देवताओं को आमन्त्रित किया, तब सती जी अनामन्त्रित होने पर भी अपने पिता के यज्ञ में पहुँच गईं और वहाँ अपने पति भगवान् शिव का अनादर-अपमान सह न पाने के कारण यज्ञकुण्ड में कूदकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद शिवगणों ने यज्ञ को तहस-नहस कर दिया और भगवान् शिव सती के शव को लेकर पृथ्वी पर विचरण करने लग गए। भगवान् शिव की इस स्थिति को देखकर भगवान् विष्णु ने सती के शव के सुदर्शन चक्र से टुकड़े कर दिए। सती के शव के अंग, आभूषण आदि जिन-जिन स्थानों पर गिरे, वे 'शक्तिपीठ' कहलाए। ये शक्तिपीठ 51 हैं। इन शक्तिपीठों का तान्त्रिक महत्त्व एवं रहस्य के सम्बन्ध में करपात्री जी महाराज कहते हैं कि जहाँ-जहाँ ये अंगादि पतित हुए, वे विशिष्ट सिद्धि के लिए स्थल हैं। भगवान् विष्णु ने साधकों की सिद्धि आदि कल्याण के लिए ये अंग विभिन्न स्थलों पर गिराए थे। हृदय से ऊर्ध्व भाग के अंग जहाँ के गिरे, वहाँ वैदिक और दक्षिण मार्ग की सिद्धि होती है और हृदय से निम्न भाग के अंग जहाँ गिरे, वहाँ वाममार्ग की सिद्धि होती है।
This story is from the October-2023 edition of Jyotish Sagar.
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