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सूखती नदियां और संरक्षण की राह
Jansatta
|October 10, 2025
देश में नदियों और सहायक नदियों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों से लेकर क्षेत्रीय नदियां कई स्थानों पर बांध, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण अपने पुराने स्वरूप को खोती जा रही हैं।
पिछले कुछ दशकों से देश में नदियों और अन्य सहायक नदियों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कहीं झरने सूख गए, तो कहीं नदियों का बहाव इतना कम हो गया कि उनकी जीवंतता पर संकट मंडरा रहा है। गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों से लेकर हमारी क्षेत्रीय नदियां कई स्थानों पर बांध, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण अपना मूल स्वरूप खो चुकी हैं। मध्यप्रदेश जिसे 'नदियों का मायका' कहा जाता है, वहां भी आज कई नदियों के उद्गम स्थल विलुप्त होने के कगार पर हैं। वास्तव में मनुष्यों ने अक्सर अपनी सुविधा और औद्योगिक विकास की प्राथमिकता में नदियों को नजरअंदाज किया है। पिछले बीस वर्षों में नर्मदा और अन्य नदियों के किनारे फैली औद्योगिक इकाइयों ने जल स्रोतों को प्रदूषित किया और गोधूलि जैसी कई छोटी नदियां और जलधाराएं सूखती गईं। आधुनिक प्रौद्योगिकी के दौर में कृत्रिम मेधा (एआई) इस संकट से नदियों को बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारत में नदियां केवल प्राकृतिक संसाधन ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी हैं। ऋग्वेद में सरस्वती को महती नदी के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि गंगा और यमुना को पुराणों तथा महाकाव्यों में देवी एवं जीवनदायिनी का दर्जा दिया गया है। गंगा स्नान को आत्मशुद्धि और मोक्ष का मार्ग बताया गया है। महाकुंभ का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि नदियों का महत्त्व केवल जल की आपूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा है। इसलिए देश में नदियों का संरक्षण केवल जल संकट की समस्या हल करने के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
This story is from the October 10, 2025 edition of Jansatta.
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