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शिक्षा व्यवस्था और संस्थाओं के दायित्व

Jansatta Kolkata

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August 30, 2025

भारतीय ज्ञान परंपरा पर हर कोई गर्व करता है और यह कहने में किसी को हिचक नहीं होगी कि भारत ही गणतंत्र को लागू करने में अग्रणी था! मगर, वर्तमान स्थिति को देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति निराश ही होगा।

- जगमोहन सिंह राजपूत

रत की राजनीति को लेकर संचार माध्यम प्रतिदिन जो परोसते हैं, वह यही दर्शाता है कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंश भूल गए हैं: सुसंस्कृत सामाजिक व्यवहार और मर्यादापूर्ण वैचारिक अभिव्यक्ति ! हमारे तरुण और युवा उन लोगों की तरफ देखते हैं, जिनका कृत्य और व्यवहार उनके समक्ष लगातार आता रहता है।

इसमें सबसे पहले आते हैं चयनित प्रतिनिधि, विशेषकर संसद में जो कुछ होता है, या नहीं होता है। सवाल है कि क्या हमारे देश में संसद को सुचारु रूप से चलाने की क्षमता प्राप्त करना शेष है? अगर ऐसा है, तो इस चिंताजनक स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है। यह प्रश्न देश भर के शिक्षकों के समक्ष भी एक चुनौती बनकर पिछले कुछ दशकों में उभरा है कि क्या हम ऐसे व्यक्तित्व निर्माण में असफल रहे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र को उसके मूलभूत सिद्धांतों और अवधारणाओं के अनुसार चला सकें ? भारतीय ज्ञान परंपरा पर हर कोई गर्व करता है और यह कहने में किसी को हिचक नहीं होगी कि भारत ही गणतंत्र को लागू करने में अग्रणी था ! मगर वर्तमान स्थिति को देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति निराश ही होगा !

प्रारंभ से 'महाजनो येन गतः सा पन्थाः' का सूत्र बच्चों को सिखाने वाली व्यवस्था इस समय असमंजस का शिकार होकर अपना रास्ता तलाश रही है। संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही का प्रसारण इस असमंजस और अकुलाहट को और बढ़ा देता है। यदि संसद में कामकाज के बजाय हंगामा या अमर्यादित व्यवहार होता है, तो ऐसे दृश्यों को सारा देश बार-बार देखता है। विचारणीय बात यह है कि किशोरों और युवाओं के संवेदनशील मस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? अगर कोई किशोर या युवा ऐसा ही व्यवहार अपने शिक्षक के साथ करता है और उस पर कार्रवाई की जाती है, तो क्या यह नैसर्गिक न्याय होगा? जनप्रतिनिधियों के पास तो सभी संसाधन और सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, मगर ऐसे किसी किशोर या युवा के सामने तो भविष्य का धुंधलका लगातार गहराता जाता है। उनका व्यग्र और व्यथित होना समाज तथा नीति निर्धारकों की समझ में आना चाहिए।

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