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जनप्रतिनिधि की जवाबदेही और जद्दोजहद
Aaj Samaaj
|October 03, 2025
भारत में एक संसदीय क्षेत्र की औसत आबादी 30 लाख से अधिक होती है, यानी स्लोवेनिया जैसे देशों से भी बड़ी, मगर संसद के लिए कर्मचारी की सुविधा अब भी केवल एक निजी सचिव तक सीमित है, जिसकी तनख्वाह कार्यालय व्यय के मद से दी जाती है। यह मद 50 हजार रुपए प्रति माह निर्धारित है। इतने में दिल्ली-एनसीआर में मकान का किराया और बुनियादी जीवन यापन के खर्चे भी मुश्किल से पूरे हो पाते हैं।
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सां सदों को कानून बनाने, व्यापक नीतियां निर्धारित करने, बजट पास करने, 1-1 रुपए के खर्च पर निगरानी रखने और फिर सीएजी, रिजर्व बैंक, नीति आयोग जैसी ढेर सारी संस्थाओं की जटिल रिपोर्टों के जरिए नतीजों का ऑडिट करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पर, काम करने की व्यवस्था ऐसी है कि एक सांसद कदम-कदम पर अपने को आशक्त महसूस करता है।
विडंबना देखिए कि हर केंद्रीय सचिव के पास विषय विशेषज्ञों का एक निदेशालय होता है। वह जब चाहे युवा पेशेवरों और सलाहकारों को नियुक्त कर सकता है। एक स्थायी समिति की प्रस्तुति के लिए करीब 2 दर्जन अधिकारी लगाए जाते हैं। मगर उस प्रस्तुति पर सवाल करने वाला सांसद केवल व्यक्तिगत जिज्ञासा और अपने एकमात्र निजी सचिव के साथ पहुंचता है।
किसी भी मंत्रालय का बजट दस्तावेज 400 से अधिक पृष्ठों का होता है, मगर एक सांसद के पास उसका वित्तीय विश्लेषक वाला कोई नहीं होता। सीएजी के प्रदर्शन ऑडिट की तुलना रिजर्व बैंक बुलेटिन और नीति आयोग के डैशबोर्ड से करनी होती है। मगर, सांसद के पास कोई नीति विश्लेषक नहीं होता।
जो संस्था संवैधानिक रूप से सरकार को ईमानदार बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है, उसे इस तरह वित्तीय सहायता दी जाती है, जैसे उसकी भूमिका केवल औपचारिक हो। फिर भी, सांसद से अपेक्षा की जाती है कि वह विशाल प्रशासनिक कार्यों की निगरानी करे, जबकि उसके पास केवल एक छोटे से पंचायत कार्यालय जैसी सुविधाएं प्राप्त हैं। उसी में सांसद को अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याएं सुलझाने के अलावा एथेनॉल मिश्रण दिशा-निर्देश, कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सुरक्षा दिशा-निर्देश और जीएसटी मुआवजा जैसे फार्मूलों को समझना होता है। ऐसे में, अनुमान लगाया जा सकता है कि क्यों संसद में बहसें सतही हो जाती हैं, विनियोग विधेयक बिना जांच के पारित हो जाते हैं और कार्यपालिका का प्रभुत्व बना रहता है।
भारत में एक संसदीय क्षेत्र की औसत आबादी 30 लाख से अधिक होती है, यानी स्लोवेनिया जैसे देशों से भी बड़ी, मगर संसद के लिए कर्मचारी की सुविधा अब भी केवल एक निजी सचिव तक सीमित है, जिसकी तनख्वाह कार्यालय व्यय के मद से दी जाती है। यह मद 50 हजार रुपए प्रति माह निर्धारित है।
This story is from the October 03, 2025 edition of Aaj Samaaj.
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