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आत्मघाती है संपदा अथवा प्रकृति का विनाश करना
Sadhana Path
|March 2024
हमारे शास्त्र केवल भक्ति और संस्कार ही नहीं सिखाते, अपितु प्रकृति के प्रति प्रेम करना भी सिखाते हैं। भगवान श्री कृष्ण की गोवर्धन कथा इसका साक्षात उदाहरण है, जहां भगवान कृष्ण मनुष्यों को प्रकृति से प्रेम करने की सीख दे रहे हैं।
मानस के उत्तरकांड में गोस्वामी तुलसीदास एक स्थान पर लिखते हैं कि पर संपदा बिनासि नसाहीं, जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं । अर्थात् दूसरों की संपत्ति को नष्ट करने वाले स्वयं नष्ट हो जाते हैं जैसे खेती का नाश करने के बाद ओला स्वयं भी नष्ट हो जाता है। आज के संदर्भ में तुलसीदास की ये पंक्ति अत्यंत प्रासंगिक व विचारणीय है। बात आज के बिगड़ते हुए भौतिक परिवेश अथवा पर्यावरण प्रदूषण की हो अथवा हमारी जीवन शैली अथवा उदात्त जीवन मूल्यों की हम आत्मघाती होते जा रहे हैं। हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं। अपने लाभ के लिए ही नहीं दूसरों को हानि पहुंचाने के लिए भी हम दूसरों का अहित करने में कम आनंद नहीं लेते लेकिन वास्तविकता ये है कि हमारा इस प्रकार का आचरण दूसरों के साथ-साथ हमारा भी उतना ही अहित कर रहा है जितना दूसरों का। दूसरों का अहित करने या होने देने के प्रयास में कई बार तो हम अपना सर्वनाश ही कर बैठते हैं।
This story is from the March 2024 edition of Sadhana Path.
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