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गब्बर का खौफ, जय-वीरू की दोस्ती और ठाकुर का बदला: “शोले” को हुए 50 साल, रमेश सिप्पी ने साझा किये अनसुने किस्से...
Mayapuri
|Mayapuri Edition 2657
15 अगस्त, 1975 को रिलीज़ हुई हिंदी सिनेमा की आईकोनिक फिल्म 'शोले' ने भारतीय सिनेमा की परिभाषा ही बदल दी थी. गब्बर सिंह का खौफ, जय-वीरू की दोस्ती, बसंती की अठखेलियाँ और ठाकुर का प्रतिशोध-हर किरदार और डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर जिंदा है. समय जैसे थम-सा गया हो, क्योंकि आधी सदी बाद भी 'शोले' उतनी ही ताज़ा और दिलचस्प लगती है. 2025 में अपने 50 साल पूरे कर चुकी इस क्लासिक फिल्म की स्वर्ण जयंती पर निर्देशक रमेश सिप्पी ने कुछ अनसुने किस्से और यादें साझा कीं, जो बताते हैं कि आखिर क्यों 'शोले' सिर्फ़ एक फिल्म नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा का जीवंत इतिहास है.
ऐसे हुई 'शोले' की शुरुआत
रमेश सिप्पी बताते हैं कि 'सीता और गीता' की सफलता के बाद फरवरी-मार्च 1973 के आसपास सलीम-जावेद से उनकी मुलाकात हुई, जिन्होंने दो लाइन की कहानी दी, जो आगे चलकर 'शोले' बनी. उन्होंने बताया कि इस जोड़ी ने 15 दिन में ही फिल्म के संवाद लिख दिए थे. वे आगे कहते हैं कि मेरे पिताजी श्री जी०पी० सिप्पी का भी इसमें अहम रोल है. वह अधूरी स्क्रिप्ट के बावजूद इस फिल्म को बनाने को तैयार हो गए.
कास्टिंग और गब्बर का किरदारफिल्म की कास्टिंग के बारे में रमेश सिप्पी बताते हैं कि शुरुआत में डैनी डेंजोंगप्पा को गब्बर का रोल मिलना था, लेकिन वे फिरोज खान की फिल्म 'धर्मात्मा' के चलते उपलब्ध नहीं थे. फिर सलीम साहब ने अमजद खान का नाम सुझाया. रमेश सिप्पी ने अमजद को मंच पर अभिनय करते देखा था. उनका मेकअप और टेस्ट हुआ और यूनिट में वो पूरी तरह घुल-मिल गए. धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और संजीव कुमार भी गब्बर (Gabbar) का रोल करना चाहते थे, क्योंकि वो बहुत पावरफुल लग रहा था, लेकिन अंत में सबने अपने-अपने रोल किए.
अमजद खान का सफरअमजद खान उस समय नए थे. सिप्पी कहते हैं, 'उन्हें काफी मोल्ड करना पड़ा. उनकी पर्सनैलिटी, चेहरा, दाढ़ी और कपड़े गब्बर के लिए बिल्कुल फिट थे. शुरू के चार महीने उनका काम नहीं हुआ, लेकिन उस दौरान वे पूरी यूनिट में घुलमिल गए. बाद में उनका काम शुरू हुआ तो सेट पर उनका दबदबा साफ झलकने लगा.'

This story is from the Mayapuri Edition 2657 edition of Mayapuri.
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