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जायद मूंग की उन्नत फसल
Modern Kheti - Hindi
|January 15, 2024
दलहनी फसल में मूंग एक महत्वपूर्ण है जिसकी खेती समस्त राजस्थान में की जाती है। जायद मूंग की खेती पेटा काश्त वाले क्षेत्रों, जलग्रहण वाले क्षेत्रों एवं बलुई दोमट, काली तथा पीली मिट्टी जिसमें जल धारण क्षमता अच्छी होती है, में करना लाभप्रद होता है। अंकुरण के लिए मृदा में उचित तापमान होना आवश्यक है। जायद मूंग की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्य करना उपर्युक्त रहता है। जायद मूंग की अधिक उपज देने वाली किस्मों का चयन करें। जबकि कुछ किस्मों (जैसे - एस. एम. एल. 668 आदि) की बुवाई मार्च के अन्त तक भी कर सकते हैं।
उन्नत किस्में:- आई पी एम-2-3 सत्या (एम एच-2-15), के-851, पूसा बैसाखी, एस.एम.एल.-668, एस.-8, एस.-9, आर. एम.जी. 62, आर. एम. जी. 268, आर. एम. जी.-344 (धनू), आर. एम. जी. - 492, पी. डी. एम. - 11, गंगा-1 (जमनोत्री), गंगा-8 (गंगोत्री) एवं एमयूएम-2, ये किस्में 60-65 दिन में पककर 10-15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज देती है।
खेत की तैयारी: इसकी बुवाई के लिये आवश्यकतानुसार एक या दो बार जुताई कर खेत को तैयार करें।
भूमि उपचार: भूमिगत कीटों व दीमक की रोकथाम हेतु बुवाई से पूर्व क्यूनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में मिलायें।
बीज की मात्रा एवं बुवाई: एक हैक्टेयर क्षेत्रफल हेतु 15-20 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। कतार से कतार की दूरी 25-30 सैंटीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सैंटीमीटर रखें।
बीज उपचार: बुवाई से पूर्व बीज को थाईरम या कैप्टान 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। अन्य दलहनी फसलों की भांति मूंग को भी राईजोबियम जीवाणु कल्चर से उपचारित कर बुवाई करने से पैदावार में बढ़ोतरी पाई जाती है।
खाद एवं उर्वरक: मूँग के प्रति बीघा 10 किलो फास्फोरस तथा 5 किलो नत्रजन बुवाई से पूर्व ड्रिल करें। 37.5 किलोग्राम प्रति बीघा जिप्सम का उपयोग बुवाई पूर्व ड्रिल करने पर उपज में वृद्धि होती है।
This story is from the January 15, 2024 edition of Modern Kheti - Hindi.
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