Poging GOUD - Vrij
अमूर्त से मूर्त का सफर
Jansatta
|November 09, 2025
भारतीय दर्शन के तमाम रहस्यवादी भाष्यों की तरह ही संविधान के साथ भी कई ऐसे आख्यान जुड़े हुए हैं, जिनका पुन:पाठ बहुत ही दिलचस्प होगा।
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आज वे तमाम लोग इसकी कसमें खा रहे हैं, जो वर्ष 1949 में न सिर्फ इसके उद्देश्यों और कामयाबी को लेकर सशंकित थे, बल्कि जिन्होंने प्राणप्रण से इसे लागू करने का विरोध भी किया था। बहरहाल, बाबा साहब आंबेडकर के अनुयायियों, खासतौर से अनुसूचित जातियों से जुड़ा विशाल समुदाय यह मानता है कि संविधान सभा द्वारा पारित विधान के मुख्य निर्माता डाक्टर आंबेडकर थे। यह एक सामान्य जानकारी है कि वे संविधान की मसविदा समिति के अध्यक्ष थे और इसमें उनके अतिरिक्त अन्य सदस्य भी थे।
जब संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई, तो तत्कालीन कांग्रेस के बड़े नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल मसविदा समिति के अध्यक्ष पद के लिए एक जर्मन संविधान विशेषज्ञ का नाम लेकर महात्मा गांधी के पास वर्धा गए थे। आपसी बातचीत के दौरान महात्मा गांधी ने उन्हें इस जिम्मेदारी के लिए डाक्टर आंबेडकर का नाम सुझाया और लंबे विमर्श के बाद यह नाम अंतिम रूप से तय हुआ। बाद में एक भाषण में आंबेडकर ने स्वीकार किया कि जब मसविदा समिति की अध्यक्षता का प्रस्ताव उनके सामने आया, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। यह अलग बात है कि समिति के कई सदस्य अपने स्वास्थ्य या राजधानी में उपस्थित न होने की वजह से संविधान सभा की कार्यवाहियों में कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाए। अपनी मेधा एवं अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान होने पर आंबेडकर ही सदन की सारी कार्यवाहियों में छाए रहे और शायद इसी वजह से यह धारणा बनी कि संविधान उन्होंने बनाया है।
तब कांग्रेस के बहुमत वाली संविधान सभा पूरी तरह से निर्णायक भूमिका में थी और वही हर प्रावधान पर लंबी बहसों के बाद अंतिम निर्णय लेती थी।
Dit verhaal komt uit de November 09, 2025-editie van Jansatta.
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