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प्राकृतिक आपदाओं में जोखिम का दायरा
Jansatta Lucknow
|July 05, 2025
कोई भी प्राकृतिक आपदा अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच भेद नहीं करती, लेकिन उनके प्रभाव सामाजिक व्यवस्था में निहित असमानताओं के कारण असमान रूप से महसूस किए जाते हैं। विशेषकर ग्रामीण, आदिवासी और वंचित समुदायों की महिलाएं इस असमानता का सबसे बड़ा भार उठाती हैं।
प्रा कृतिक आपदाएं केवल भौतिक रूप से ही विनाश नहीं लातीं, बल्कि वे उन अदृश्य सामाजिक खामियों को भी उजागर कर देती हैं, जो अलग-अलग सामाजिक वर्गों के आधार पर लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं।
ये घटनाएं समाज में पहले से मौजूद असमानताओं को और गहरा कर देती हैं। यों प्रभावित इलाकों में सभी पर इनका असर पड़ता है, लेकिन विशेष रूप से महिलाएं और लड़कियां इन आपदाओं के प्रभाव से ज्यादा जोखिम झेलती हैं। उनके स्वास्थ्य, विस्थापन, शिक्षा, आजीविका और सुरक्षा जैसे मूलभूत अधिकार संकट में पड़ जाते हैं।
अध्ययन बताते हैं कि चाहे चक्रवात हो, बाढ़ व सूखा हो या फिर भूकम्प, इन आपदाओं के समय महिलाओं और बच्चों की मृत्यु की संभावना पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण जो लोग विस्थापित होते हैं, उनमें से लगभग अस्सी फीसद महिलाएं होती हैं। यह आंकड़ा तब और भयावह हो जाता है, जब हम यह देखते हैं कि मौजूदा सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाएं महिलाओं को न तो वैकल्पिक आजीविका के पर्याप्त अवसर देती हैं और न ही उन्हें प्रकृति के साथ अपनी पारंपरिक गतिशीलता बनाए रखने की स्वतंत्रता देती हैं। वर्ष 2010 में पाकिस्तान में आई विनाशकारी बाढ़ ने भी इस कठोर सच्चाई को उजागर किया था। सीमित स्वतंत्रता और संसाधनों तक कठिन पहुंच ने वहां की महिलाओं को और अधिक असुरक्षित बना दिया।
Dit verhaal komt uit de July 05, 2025-editie van Jansatta Lucknow.
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