Poging GOUD - Vrij
साइकल के कुत्ते
Aha Zindagi
|June 2025
साइकल के कुत्ते होते हैं और वे कुत्ते फेल भी हो जाते हैं! ऐसी अद्भुत जानकारी पाना और साइकल चलाने की षोडश कलाओं में माहिर हो जाना तब हर किशोर का सपना हुआ करता था।
बात उस युग की है जब भारत में दो तरह के स्टार्टअप्स का ज़ोर था : एक, साइकल किराए पर देने वाला और दूसरा, कॉमिक्स किराए पर देने वाला। किराया अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देते कुछ जियाले बिज़नेस टायकून वो भी होते थे जिन्होंने अपनी साइकल दुकान की दीवारों पर कॉमिक्स टांगकर दोनों व्यवसायों में अपनी पैठ बना ली थी। मिर्ची साइज़ के बच्चे साइकल दुकानों से छोटी-सी साइकल भाड़े पर लेकर पूरे मोहल्ले में आतंक मचाते घूमते थे। कुछ अत्यंत एडवेंचरकारी बच्चों ने अपने-अपने पिताजी की विशालकाय साइकलों की सीट दाएं हाथ से पकड़कर, फ्रेम के बीच अपना शरीर फंसाकर साइकल चलाने के उस योगासन को जन्म दे दिया था जिसे उस कालखंड के इतिहासकारों ने एकमत से ‘कैंची-स्टाइल' का नाम दिया है।
चूंकि मेरे अपने निजी पिताजी को साइकल चलानी नहीं आती थी और अठन्नी का सदुपयोग मैंने सिर्फ़ किराए पर कॉमिक्स लेकर किया था, तो ना मैं कैंची कला सीख पाया, ना ही किराए पर साइकल देने वालों की मुट्ठी गरम करने का पुण्य प्राप्त कर पाया। नब्बे के दशक में जब तक मैंने साइकल चलाना सीखा, मेरे तमाम मित्र इसमें न केवल पारंगत हो चुके थे वरन अधिकतर ने तो हाथ छोड़कर साइकल चलाने का हुनर भी साध लिया था। एक हाथ से बालों पर कंघी फिराकर दूसरे हाथ से बाल सैट कर लेने से लेकर दोनों पैर साइकल के हैंडल पर धरकर जूतों के फीते बांधने तक, मानो हर काम साइकल पर कर लेना ही उनके जीवन का लक्ष्य था। अगले चक्के को उठाकर पिछले चक्कों पर साइकल चलाना तो ख़ैर थोड़ा-थोड़ा सभी ने सीख लिया था। साइकल-चालन के ऐसे नित नूतन आयामों में अपनी कला का हाहाकारी तांडव मचाते मित्रों के बीच नव-साइकल-चालक होने का दर्द वही समझ सकता है जिसने धूम जैसी सफल फिल्म श्रृंखला में उदय चोपड़ा होने का दर्द झेला हो।
मिस्त्री से मुलाक़ात के बाद...
Dit verhaal komt uit de June 2025-editie van Aha Zindagi.
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