Poging GOUD - Vrij
अभी मज़ा चखाता हूं!
Aha Zindagi
|January 2026
आख़िर लोग तुरत-फुरत आहत क्यों हो जाते हैं, क्यों हर असहमति को इज़्ज़त का सवाल बना लेते हैं, और कैसे इतिहास, परवरिश और व्यवस्था मिलकर हमारे भीतर यह 'सबक़ सिखाने' वाली कुसंस्कृति पैदा करते हैं? यह मंथन ज़रूरी है।
समाज में एक बेचैनी पसरी हुई है। एक छोटी-सी बात, एक हल्की-सी असहमति भी लोगों के भीतर ऐसा तूफ़ान खड़ा कर देती है कि तत्काल अपनी ताक़त साबित करना सबसे ज़रूरी है।
भारतीय समाज में एक वाक्य अक्सर सुनने को मिल ही जाता है, अपने निजी जीवन में भी और सार्वजनिक रूप से भी, 'अभी मज़ा चखाता/चखाती हूं।' ये सिर्फ़ शब्द नहीं, हमारे भीतर की मानसिकता का प्रतिबिंब है। यह मानसिकता उस असंतुलन की ओर संकेत करती है जिसकी जड़ें हमारे अंतर्मन और सामाजिक संरचना में गहराई तक दबी हुई हैं। सड़क पर चलते हुए किसी का अनजाने में धक्का लग जाना, ऑफ़िस में मामूली-सी बात पर अनबन हो जाना, या परिवार में किसी छोटी-सी बात पर असंतोष या बहस, इन हर स्थितियों में यह प्रवृत्ति दिखाई देती है कि इंसान तुरंत सामने वाले को उसकी 'हैसियत दिखाने' या 'सबक़ सिखाने' की भावना में उतर आता है।
आत्मसम्मान की चौखट पर अहंकार
अगर इसे बारीकी से देखें तो यह प्रवृत्ति केवल गुस्सा नहीं दर्शाती, यह एक लगातार सुलगता आक्रोश है जो समाज, व्यक्ति और पूरे सिस्टम, तीनों स्तरों पर फैला हुआ है। आख़िर इंसान इतना उतावला क्यों हो जाता है नाराज़ होने, बुरा मानने या भिड़ने के लिए? यह आदत हमारी मानसिकता, समाज की मानसिक सेहत, आपसी रिश्तों और सामूहिक सुख, सभी पर गहरा प्रभाव डालती है। मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो यह स्वाभिमान और अहंकार के बीच की बेहद महीन रेखा है, जहां अक्सर अहंकार स्वाभिमान पर हावी हो जाता है।
इसका आविर्भाव आमतौर पर तब होता है जब इंसान भीतर से असुरक्षित महसूस करता है। भारतीय समाज में आज भी हमारी पहचान आत्म-आधारित कम और दूसरों की राय या सामूहिक मूल्यांकन पर अधिक निर्भर है। जैसे, 'लोग क्या कहेंगे?', 'उन्होंने तुम्हारे बारे में यह कहा...'।
लोग अपने आप को कभी भी अहमियत नहीं देते, दूसरों के मूल्यांकन पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में जब कोई उन्हें ज़रा-सी भी चोट पहुंचाता है तो प्रतिक्रिया बहुत बड़ी हो जाती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके आत्मसम्मान और यहां तक कि उनके अस्तित्व को चुनौती दी गई है। ऐसे में तर्क से ज़्यादा लोग भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं, और इसी से बदला लेने, सबक़ सिखाने या रौब दिखाने जैसी भावनाएं जन्म लेती हैं।
Dit verhaal komt uit de January 2026-editie van Aha Zindagi.
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