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चीतों का अमृतकाल
Kendra Bharati - केन्द्र भारती
|Kendra Bharati - May 2023
भारतीय स्वतंत्रता के अमृतकाल में यह प्रसन्नता की बात है कि कूनो राष्ट्रीय उद्यान में सियाया नाम की नामीबियाई मूल की मादा चीता ने चार शावकों को जन्म दिया है।
७५ वर्ष पहले भारत की धरती से चीतों की प्रजाति के लुप्त होने के बाद भारतीय वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में यह पहली, अनूठी और उल्लेखनीय घटना है। यह वंशवृद्धि इसलिए भी आशा की किरण है, क्योंकि २७ मार्च, २०२३ को साशा नामक मादा की मृत्यु हो गई थी। इससे कुछ समय के लिए इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना पर प्रश्न किए जाने लगे थे। लेकिन अब चार शावकों के जन्म के बाद उद्यान में चीतों की संख्या २३ हो गई है। इनमें १६ वयस्क हैं, जो प्रजनन में सक्षम हैं। ऐसी भी जानकारी है कि एक और मादा गर्भवती है।
गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन १७ सितम्बर को नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में एक भव्य समारोह आयोजित करके छोड़ा था । इन चीतों के यहां के जलवायु में ढलने की आशंकाएं आरम्भ से से ही उठ रही थीं, जो एक मादा चीता 'साशा' की बीमारी से मौत के बाद परिणाम में बदलती दिख रही है। वन्य प्राणी विशेषज्ञ इस मौत का कारण किडनी खराब ( रीनल फेल्योर) होना बता रहे हैं। साशा २२ जनवरी से बीमार थी। निर्जलीकरण के चलते उसे तरल भोजन दिया जा रहा था। यह तो ठीक है, लेकिन इस मौत के इतिहास में दो चौकानेवाले तथ्य सामने आए हैं। एक राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के एडीजी एस. पी. यादव का कहना है कि भारत आने से पहले ही यह चीता बीमार था। क्योंकि इसकी बीमारी सामने आने के बाद नामीबिया के चीता फाउंडेशन से इसके उपचार का इतिहास बुलाया गया। इसी से इसकी बीमारी का पता चला । १५ अगस्त, २०२२ को इसके लिए गए खून के नमूने से ज्ञात हुआ कि इसमें क्रिएटिनिन का स्तर ४०० से ज्यादा है। दूसरी जानकारी मिली कि नामिबिया में रहते हुए इसने एक प्लास्टिक की गेंद को खा लिया था। जिसे शल्य क्रिया के बाद पेट से निकाला गया।
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