हर कौम कह रही है हमारे हुसैन हैं
Aaj Samaaj
|July 07, 2025
680 ईस्वी अर्थात मुहर्रम 61 हिजरी में इराक में करबला स्थित मैदान फुरात नदी के किनारे पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन व उनके परिवार के लगभग 72 सदस्यों को सीरिया के तत्कालीन तानाशाह यजीद की सेना ने उसके आदेश पर बड़ी ही बेरहमी से 10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन तीन दिन का भूखा प्यासा कत्ल कर दिया था। उसके बाद उनके परिवार के तंबुओं को जलाया व लूटा गया। बाद में इमाम हुसैन के परिवार, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों को बंदी बनाकर कूफा और फिर सीरिया ले जाया गया। इस दौरान उनके साथ क्रूर व्यवहार किया गया।
पूरी दुनिया में इन दिनों इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम के दौरान करबला की दास्तान याद की जा रही है। 680 ईस्वी अर्थात मुहर्रम 61 हिजरी में इराक में करबला स्थित मैदान फुरात नदी के किनारे पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन व उनके परिवार के लगभग 72 सदस्यों को सीरिया के तत्कालीन तानाशाह यजीद की सेना ने उसके आदेश पर बड़ी ही बेरहमी से 10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन तीन दिन का भूखा प्यासा कत्ल कर दिया था। उसके बाद उनके परिवार के तंबुओं को जलाया व लूटा गया। बाद में इमाम हुसैन के परिवार, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों को बंदी बनाकर कूफा और फिर सीरिया ले जाया गया। इस दौरान उनके साथ क्रूर व्यवहार किया गया। उन्हें रास्ते भर यातनायें दी गयीं उनके सरों से चादरें छीनी गयीं, हाथों में हथकड़ियां, रस्सियां व पैरों में बेड़ियाँ डाली गयीं। गौरतलब है कि हजरत मुहम्मद के घराने के साथ घोर अत्याचार करने वाला उस समय का तानाशाह यजीद पुत्र मुआविया स्वयं भी मुसलमान था और उसकी सेना के अत्याचारी सदस्यों में भी अनेक हाफिज, कारी और लंबी लंबी दाढ़ियों वाले धर्मगुरु सरीखे अनेक मौलवी शामिल थे। यजीद अपने समय का एक शक्तिशाली परन्तु क्रूर, अधर्मी, अय्याश शासक था।
वह अपनी ताकत के बल पर अपनी सत्ता चलने के लिये हजरत इमाम हुसैन का समर्थन चाहता था। परन्तु हजरत हुसैन ने उसकी दुष्ट की ताकत की परवाह नहीं की और उसके हाथों पर बैयत करने से इंकार कर दिया। हजरत हुसैन की शहादत और करबला की घटना को पूरे विश्व के सभी धर्मों व विश्वास के लोग पूरी श्रद्धा व सम्मान से देखते हैं। इस घटना को धर्म के बजाय इतिहास से जुड़ी विश्व की अभूतपूर्व घटना होने के नाते पूरी दुनिया के में साहस, बलिदान और अन्याय के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि विभिन्न धर्मों के लोग हजरत हुसैन की नैतिकता, मानवता और सत्य के लिए उनके बलिदान की प्रशंसा करते हैं।
Denne historien er fra July 07, 2025-utgaven av Aaj Samaaj.
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