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तपस्या का अर्थ
Sadhana Path
|November 2025
तपस्या करने का अर्थ मात्र इतना ही है कि उन सभी चीजों को ना कहना सीखना जो तुम्हारे अंदर नैसर्गिक हैं।
अगर तुम अभी भूखे हों, तुम अपने आप से कहो, नहीं, मुझे अपना प्राणायाम करना है। तुम कुछ अच्छा खाना चाहते हो, तुम कहो, नहीं मैं केवल सूखी रोटी खाऊंगा। तुम्हें नींद आ रही है, तुम कहो, नहीं, मैं ध्यान करूंगा। यही नेति-नेति है, अपनी पसंद और नापसंद का अतिक्रमण करने का प्रयास करना- मन को ना, ना कहते जाना। निश्चित रूप से यह मंत्रों और नशीले पदार्थों से कहीं ज्यादा बेहतर है, क्योंकि यह तुम्हारे अंदर एक खास रूपांतरण लाएगा। जब तुम अपने मन को ना कहना जारी रखते हो, मन धीरे-धीरे वश में आने लगता है, यह कम से कम हो जाता है। मन चाहे जो कुछ भी कहता है, तुम ना कहो। यही अभ्यास है। जब तुम अपने मन के प्रति पूर्णतः ना, ना हो जाते हो तब तुम जीवन के प्रति एक बड़ी हां बन जाते हो। यही तपस्याओं का स्तर है, जिसे किया जा सकता है। यह तुम्हें कुछ रूपांतरण की तरफ ले जाएगा और एक व्यक्ति को चेतना के परम स्तर तक भी ले जा सकता है अगर वह वास्तव
Denne historien er fra November 2025-utgaven av Sadhana Path.
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Sadhana Path
ओशो शब्दों के सम्राट हैं
पहली बात तो ओशो एक विचारक हैं, महान विचारक। जो किसी धर्म से नहीं विचारों से जुड़ा रहा। विचारों से जुड़ने का मतलब है सत्य से जुड़ना। जो सत्य से जुड़ता है सब उसके दुश्मन हो जाते हैं, यही कारण था कि ओशो के इतने दुश्मन पैदा हुए। ओशो के साथ बस एक दिक्कत रही कि 99 प्रतिशत वह लोग उनके खिलाफ रहे जिन्होंने उन्हें न कभी सुना है, न ही कभी पढ़ा है।
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अद्भुत बौद्धिक क्षमता से युक्त व्यक्ति
मेरी दृष्टि में ओशो अपने समय के सबसे ज्यादा बौद्धिक क्षमता से युक्त व्यक्ति थे जिनमें ज्ञान और विज्ञान को अपने तर्कों के माध्यम से प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता थी। आप उनसे सहमत हो या न हो वो अलग बात है। मेरी नजर में उन जैसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है।
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काल की शिला पर अमिट हस्ताक्षर हैं ओशो
जब हम किसी भी व्यक्तित्व के बारे में सोचते हैं तो विचारों में सबसे पहले उसकी आकृति उभरती है। ऐसे ही ओशो के बारे में सोचते ही एक चित्र उभरता है, ओशो की घनी दाढ़ी, उन्नत भाल, समुद्र सी गहराई और बाज-सी तीक्ष्ण दृष्टि वाला उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आभा मंडल रचता है, कि हम जैसे लोग जिन्होंने उन्हें सिर्फ फोटो में देखा है, उन्हें पढ़ने या सुनने के लिए विवश हो जाते हैं। ओशो की आवाज, वाणी, उनके शब्द, भाषा शैली, अभिव्यक्ति एवं वक्तव्य की बात करूं तो वह अद्वितीय है।
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वास्तु उपायों से बनाएं नववर्ष को मंगलमय
नया साल अपने साथ खुशियां और सौहार्द लेकर आता है। ऐसे में पूरे वर्ष को और भी ज्यादा खास बनाने के लिए वास्तु संबंधित कुछ उपाय अपनाए जा सकते हैं। इससे घर की परेशानियां दूर होने के साथ आर्थिक तंगी से भी छुटकारा मिलेगा।
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बुद्ध के गुणों का पावन संदेश
जोव्यक्ति बुद्ध होता है, वह सम्यक संबोधि हासिल कर लेता है, वह अनन्त गुणों से भर जाता है। उसके गुणों का ध्यान करते-करते धर्म उजागर होने लगता है। ऐसे में बुद्ध के गुणों का वर्णन करने वाले एक-एक शब्द को समझना आवश्यक है। जो इस प्रकार है-
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इस सदी का चमत्कार हैं ओशो
ओशो से मेरा परिचय धर्मयुग के कारण हुआ उसमें उनके लेख, साक्षात्कार छपते थे। और मेरे कॉर्टून जिसमें मेरा डब्बू जी के नाम से एक कॉलम आता था, जिसे ओशो बहुत पसंद करते थे, यहां तक कि वह अपने प्रवचनों के बीच संन्यासियों को हंसाने के लिए उस पत्रिका को हाथ में लेते और कहते 'देखते हैं इस हफ्ते डब्बू जी क्या कहते हैं' और सबको उसमें से कोई लतीफा सुनाते थे। मैंने ओशो को खूब पढ़ा है। मैं उनके प्रवचनों से बहुत प्रभावित रहा हूं।
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सर्दियों में बच्चों की इम्यूनिटी बढ़ाने के अचूक उपाय
सर्दियों के दस्तक देते ही सर्द हवाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो आगे चलकर बच्चों में सर्दी और खांसी की वजह साबित होता है। ऐसे में अगर बात बच्चों की सेहत की करें तो उनका ख्याल रखना बेहद जरूरी हो जाता है।
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सर्दी-खांसी से बचे रहना चाहते हैं तो जरूर खाएं ये सुपरफूड्स
बदलते मौसम में अक्सर इम्युनिटी कमजोर हो जाती है इसलिए इस दौरान ऐसा आहार लेना चाहिए जो आपको भीतर से मजबूत बनाए। चलिए जानते हैं कि सर्दियों में क्या खाएं कि शरीर को शक्ति और ऊर्जा दोनों मिले।
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बात जो जरूरी है वो जरा अधूरी है
दूसरे ही पृष्ठ पर सर्वप्रथम मेरा चेहरा देखकर आपका हैरान होना लाजमी है क्योंकि मेरा चेहरा इस विशेषांक के साथ न तो निर्णय करता है, न ही कोई तालमेल बिठाता है। क्योंकि न तो मैं कोई प्रसिद्ध हस्ती हूं न ही बुद्धिजीवियों की श्रेणी में मेरा कहीं कोई स्थान है। तो क्या मैं पत्रिका का संपादक होने के नाते पद और पन्नों का फायदा उठा रहा हूं? नहीं। न तो ऐसी मेरी कोई मंशा है, न ही कोई चाल। सच कहूं तो यह मेरी मजबूरी है। पर मेरी इस मजबूरी का संबंध किसी लाचारी या असहाय जैसी नकारात्मक अवस्था से नहीं है। मेरे लिए मजबूरी का मतलब उस विवशता से है जिसके लिए मेरा लिखना ही एक मात्र विकल्प है और यही विकल्प इस अंक का कई हद तक आधार भी है।
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ओशो अस्तित्व की एक अभिव्यक्ति हैं
ओशो से मिलना एक ही शर्त पर होगा- आईना हो जाओ।
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