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दूषित पेयजल से गहराता संकट
Jansatta
|January 14, 2026
देश में जल आपूर्ति अवसंरचना की जर्जर स्थिति और गुणवत्ता परीक्षण की कमजोर व्यवस्था ने शहरी और ग्रामीण जीवन के स्वास्थ्य को जोखिम में डाल दिया है। इंदौर की त्रासदी एक चेतावनी है कि व्यवस्था में अब सुधार की नितांत आवश्यकता है।
जल प्रदूषण आज मनुष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह प्रबंधन में लापरवाही बरतने का भी नतीजा है। जल के संरक्षण और उसकी स्वच्छता को लेकर योजना बनाने तथा उसे क्रियान्वित करने में गंभीरता एवं कुशलता का अभाव रहता है। घर-घर जल पहुंचाने की योजना जरूर अच्छी है। मगर इसी के साथ नदियों की सफाई और जल आपूर्ति करने करने वाली पाइपलाइनों की समय-समय पर जांच की जाती, तो समस्या गंभीर नहीं होती। इंदौर में दूषित पेयजल के सेवन से हुई लोगों की मौत ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि भारत का जल संकट केवल मात्रा का नहीं, बल्कि गुणवत्ता, निगरानी और शासन की गंभीर विफलताओं का परिणाम है। यह घटना किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस अदृश्य संकट का प्रतीक है, जो देश के लगभग हर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्र में अलग-अलग रूपों में मौजूद है। जल, जिसे जीवन का आधार माना जाता है, जब वही जीवन के लिए ही घातक बन जाए, तब यह प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि संस्थागत असफलता का संकेत है।
संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल रपट 2024 के अनुसार, विश्व की लगभग 2.2 अरब आबादी को आज भी सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। भारत, जहां विश्व की अठारह फीसद जनसंख्या निवास करती है और जहां मीठे जल संसाधनों का मात्र चार फीसद हिस्सा उपलब्ध है, वह इस वैश्विक जल संकट के केंद्र में है। मगर इंदौर की घटना स्पष्ट करती है कि चुनौती केवल जल की उपलब्धता तक सीमित नहीं, बल्कि यह सवाल भी उतना ही अहम है कि जो जल उपलब्ध कराया जा रहा है, वह कितना सुरक्षित और उपयोग के योग्य है। घरों तक पहुंचाए जा रहे जल की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी का अभाव अब भी बन हुआ है, जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है।
このストーリーは、Jansatta の January 14, 2026 版からのものです。
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