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हिमनदों के अस्तित्व पर बढ़ता संकट

Jansatta

|

June 19, 2025

हिमनदों का पिघलना केवल बर्फ की मात्रा में कमी का मामला नहीं है। यह जलवायु तंत्र की जटिलता, पारिस्थितिकी संतुलन, जल स्रोतों की स्थिति, कृषि उत्पादन, विद्युत आपूर्ति और मानवीय जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ मसला है।

- देवेंद्रराज सुथार

मनदों का तेजी से पिघलना आज सबसे गंभीर पर्यावरणीय संकट बन चुका है। यह केवल क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव विश्व के प्रत्येक कोने में देखा जा सकता है। हाल ही में एक विज्ञान शोध पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है विश्व भर में दो लाख से अधिक हिमनदों की स्थिति का आकलन करने पर पता चला है कि अब ये पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। इस अध्ययन में अनेक देशों के वैज्ञानिकों ने मिलकर आठ विभिन्न जलवायु प्रतिरूपों का सहारा लिया और भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाया। इसी दौरान ताजिकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार इस मुद्दे पर वैश्विक सम्मेलन का आयोजन किया। इससे पता चलता है कि स्थिति कितनी गंभीर होती जा रही है।

मानव सभ्यता ने जब से औद्योगीकरण की ओर कदम बढ़ाया है, तब से प्रकृति का संतुलन निरंतर प्रभावित होता चला गया है। कारखानों की स्थापना, ईंधन के अत्यधिक उपयोग और बेतहाशा वृक्षों की कटाई ने धरती के तापमान को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। आज धरती का औसत तापमान औद्योगिक युग की शुरुआत की तुलना में लगभग डेढ़ डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। देखने में यह वृद्धि बहुत छोटी प्रतीत हो सकती है, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक और दीर्घकालिक है। वैज्ञानिकों का मत है कि यदि यह तापमान दो डिग्री के भीतर नियंत्रित नहीं किया गया, तो इस सदी के अंत तक तीन चौथाई हिमनद पूरी तरह विलुप्त हो सकते हैं। और यदि तापमान को डेढ़ डिग्री तक सीमित रखने में भी सफलता मिलती है, तब भी लगभग आधे हिमनद समाप्त हो जाएंगे।

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