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कपास में होगा आर्थिक नुकसान, जो नहीं किया बीमारियों का निदान
Modern Kheti - Hindi
|15th June 2025
कपास भारत की कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह एक प्रमुख नकदी फसल है, जिसे आमतौर पर "सफेद सोना" कहा जाता है।
भारत कपास का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक देश है और इसकी खेती पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश सहित कई राज्यों में की जाती है। कपास मुख्य रूप से वस्त्र उद्योग में उपयोग की जाती है, जबकि इसके बीजों से तेल निकाला जाता है और बचा हुआ हिस्सा पशुओं के चारे के रूप में काम आता है। यह फसल विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाई जाती है और लवणता सहन कर सकती है, लेकिन जलभराव के प्रति संवेदनशील होती है। भारत में यह फसल अधिकांशतः वर्षा आधारित क्षेत्रों में उगाई जाती है। कपास की चार प्रमुख किस्में होती हैं : गॉसिपियम हिसुंटम, गॉसिपियम बार्बडेंस, गॉसिपियम अर्बोरियम और गॉसिपियम हर्बेसियम। कपास की फसल पर कई बीमारियां हमला करती हैं, जो उपज और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करती हैं। ये रोग अकसर मृदाजनित जीवाणुओं से फैलते हैं। इसलिए मृदा प्रबंधन और समय पर रोग नियंत्रण आवश्यक होता है। इस लेख में इन बीमारियों और उनके प्रभावी प्रबंधन की जानकारी दी गई है।
1. कपास का पत्ता मरोड़ रोग : यह रोग कॉटन लीफ कर्ल वायरस द्वारा फैलाया जाता हैं जो किजेमिनिविरिडे परिवार का है। यह वायरस सफेद मक्खियों के वयस्कों द्वारा फैलाया जाता है।
रोग के लक्षण : पहले इसका प्रभाव ऊपर की पत्तियों पर दिखता है। पत्तियों का अधिक हरा दिखाई देना, ऊपर और नीचे की ओर मुड़कर कप जैसा आकार ले लेना, छोटी नसें मोटी हो जाना तथा शिराओं का मोटा होना इस रोग के मुख्य लक्षण हैं। रोग के प्रकोप के बढ़ने के साथ, प्रभावित पत्तियों की निचली सतह पर कप के आकार की छोटी-छोटी पत्तियां विकसित हो जाती हैं, जिसे इनेशन कहा जाता है। प्रभावित पौधे छोटे रहते हैं और इनकी बढ़वार पूरी तरह रुक जाती है। इसके परिणामस्वरूप उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ता है।
2. उखेड़ा (उकठा) रोग : उखेड़ा रोग देशी एवं अमेरिकन कपास दोनों में लगता है।
このストーリーは、Modern Kheti - Hindi の 15th June 2025 版からのものです。
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