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बुद्धि पर पहरा
Jyotish Sagar
|May 2025
यदि लग्नेश पंचम भाव में स्थित होता है, तो पूर्व पुण्यों के प्रताप से जातक के अन्दर ऐसी कोई प्रतिभा अवश्य होती है, जिसके लिए उसने इस जन्म में कोई प्रयास नहीं किया होता।
जन्मकुण्डली का पंचम भाव बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका कारण यह है कि हमारा ज्योतिषशास्त्र पूर्णतः कर्मफल के सिद्धान्त पर ही आधारित है और पंचम भाव पूर्व अर्जित पुण्यों का भाव कहलाता है। प्रत्येक जातक जन्म-जन्मान्तर की चेतनाओं को वहन करता है। पूर्वजन्म के पुण्य अथवा पाप ही हमारे चित्त पर अंकित होते हैं और उसी के अनुरूप ही हमारी बुद्धि और विवेक का निर्माण होता है।
अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि यदि पूर्वजन्म में हमने सद्कर्म किए हों, तो ही हमारी बुद्धि सात्विक होती है तथा हमारे अन्दर बुद्धिमत्ता होती है। यही कारण है कि पंचम भाव हमारी बौद्धिक क्षमताओं तथा विवेक का भी भाव है। किसी भी जातक की जन्मपत्रिका के पंचम भाव तथा पंचमेश का शुभ स्थिति में होना बहुत अच्छा माना जाता है। ऐसी स्थिति में पंचमेश की दशा-अन्तर्दशा में पूर्वार्जित पुण्य जाग्रत होने के कारण जातक को अत्यधिक शुभ परिणामों की प्राप्ति होती है।
पंचम भाव एवं पंचमेश की शुभ स्थिति होने पर ही जातक की बुद्धि तथा विवेक सही दिशा में काम करते हैं। इसके विपरीत यदि पंचम भाव अथवा पंचमेश पीड़ित हों, तो यह भाव पूर्व अर्जित पापों के फल देता है। ऐसी स्थिति में जातक अपनी बुद्धि का सदुपयोग नहीं कर पाता अथवा उसकी बुद्धि अनुचित दिशा में कार्य करवाने के लिए बाध्य करती है। पंचम भाव से व्यक्ति की मानसिकता का पता चलता है। पंचम भाव यदि अशुभ प्रभाव में हो, तो यह स्थिति जन्मपत्रिका के लिए अच्छी नहीं मानी जाती, क्योंकि इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि जातक ने पूर्वजन्मों में पुण्य कार्य नहीं किए हैं।
जन्मकुण्डली का पंचमेश यदि किसी अन्य भाव के स्वामी के साथ युति, दृष्टि अथवा राशि परिवर्तन करके सम्बन्ध बना रहा हो, तो उस भाव के भी सुखद परिणाम प्राप्त होते हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में पूर्व अर्जित पुण्यों का फल वह भाव भी प्राप्त करता है, जिसके साथ पंचमेश सम्बन्ध बना रहा हो।
Cette histoire est tirée de l'édition May 2025 de Jyotish Sagar.
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