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उच्च आर्थिक वृद्धि और गुणवत्तापूर्ण जीवन के बीच संतुलन जरूरी
Business Standard - Hindi
|December 16, 2025
पिछले कुछ हफ्तों के दौरान दिल्ली और देश के अन्य महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण ने भारतीय नीति निर्माताओं को एक ऐसे विषय का सामना करने के लिए विवश कर दिया है जिसकी वे अक्सर अनदेखी करते रहे हैं।
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वह विषय है कुल उत्सर्जन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत न कि केवल अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता पर। वायु प्रदूषण की यह विकट समस्या ऐसे समय में सरकार सहित सबकी सांसे रोक रही है, जब भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर तेज करने और वर्ष 2047 तक एक विकसित देश बनने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है।
कुल उत्सर्जन और अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता के बीच का अंतर बेहद महत्त्वपूर्ण है। भारत ने उत्सर्जन तीव्रता कम करने पर ध्यान केंद्रित किया है यानी वह आर्थिक उत्पादन की प्रति इकाई उत्सर्जन कम करना रहा है। भारत ने वर्ष 2030 तक जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता वर्ष 2005 के स्तर से 45 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य निश्चित रूप से साधा जा सकता है क्योंकि भारत 2005 से उत्सर्जन तीव्रता लगभग 36 फीसदी तक कम करने में सफल रहा है।
मगर समस्या यह है कि इससे वास्तव में हवा स्वच्छ नहीं होती है या वैश्विक तापमान में वृद्धि थमती नहीं। पूर्ण स्तर पर उत्सर्जन अभी भी बढ़ रहा है और तब तक बढ़ता रहेगा जब तक नीति निर्माता आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए नीतियां तैयार करते समय उत्सर्जन कम करने या कम से कम इसे सीमित रखने का तरीका नहीं खोज लेते। मौजूदा अध्ययनों से पता चलता है कि भारत का कुल उत्सर्जन वर्ष 2040 तक या जीडीपी की मौजूदा वृद्धि दर पर और अधिक समय तक बढ़ता ही रहेगा।
तेज आर्थिक तरक्की और ऊंची आर्थिक वृद्धि के साथ उत्पन्न होने वाली उत्सर्जन की अपरिहार्य समस्या के बीच संतुलन साधना एक ऐसी चुनौती रही है जिसका सामना सभी विकासशील देश कर रहे हैं। त्वरित विकास के लिए अनिवार्य रूप से ऊर्जा की अधिक खपत, उच्च निर्माण गतिविधियों और उच्च औद्योगिक उत्पादन आदि की जरूरत होती है।
Cette histoire est tirée de l'édition December 16, 2025 de Business Standard - Hindi.
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