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विभीषण का राज्याभिषेक और सीता जी की अग्निपरीक्षा

Jyotish Sagar

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February 2026

गगातट पर चल रही रामकथा में 27वें दिन की कथा चल रही है, जिसमें लंका के युद्ध में रावण वध का प्रकरण समाप्त हो चुका है और विभीषण के राजतिलक का प्रकरण आरम्भ होने वाला है। सभी श्रोतागण एकाग्रता से कथा का आनन्द ले रहे हैं। मंच पर विराजमान स्वामी जी रसपूर्ण तरीके से कथा सुना रहे हैं। अब आगे की कथा....

विभीषण का राज्याभिषेक और सीता जी की अग्निपरीक्षा

“रावण की अन्त्येष्टि क्रिया करने के उपरान्त विभीषण जी भगवान् राम के पास आकर सिर नवाकर खड़े हुए। तब भगवान् राम ने लक्ष्मण जी को बुलाया और कहा कि 'तुम वानरराज सुग्रीव, अंगद, नल-नील, जामवन्त जी और मारुति सभी लोग विभीषण के साथ जाओ और इनका राजतिलक करो। पिताजी के वचनों के कारण मैं नगर में प्रवेश नहीं कर सकता, परन्तु अपने ही समान वानर और छोटे भाई को भेजता हूँ।'

“भगवान् की आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी वानर योद्धाओं और विभीषण जी के साथ लंका जाते हैं। वहाँ विभीषण जी का विधिवत् राज्याभिषेक करते हैं। राज्याभिषेक के उपरान्त लक्ष्मण जी विभीषण जी, सुग्रीव एवं अन्य वानर-रीछ प्रमुखों के साथ भगवान् श्रीराम के पास आ जाते हैं। सभी खुश हैं। रावण का वध हो चुका है और विभीषण जी को लंका का राज मिल गया है।”

स्वामी जी एक क्षण के लिए रुकते हैं और कथा को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि “भगवान् ने रावण का वध कर पृथ्वीवासियों एवं देवताओं को उपकृत किया, तो वहीं विभीषण जी को लंका का राज देकर अपना वचन पूरा किया। इसके बाद उन्होंने हनुमान जी को बुलाकर कहा कि 'तुम लंका जाओ और जानकी को सब समाचार सुनाओ तथा उनका कुशल समाचार लेकर वापस आओ।'

“प्रभु की आज्ञा से हनुमान जी वापस लंका पहुँचे। पहली बार हनुमान जी जब लंका गए थे, उसमें और अबमें भारी अन्तर था। पहले हनुमान जी सुरक्षाकर्मियों से बच-बचाकर मसक के समान लघु रूप रखकर गए थे, तो अबकी बार राज अतिथि के रूप में उन्होंने लंका में प्रवेश किया। जगह-जगह उनका स्वागत हुआ और राजकर्मी उन्हें सीता जी के पास लेकर गए। हनुमान जी ने सीता जी को देखकर दूर से ही प्रणाम किया। सीता जी ने हनुमान जी को देखकर प्रसन्नता के साथ उन्हें आशीर्वाद देते हुए पूछा, 'हे तात! कहो! कृपा के धाम मेरे प्रभु, छोटे भाई और वानरों की सेना सहित सभी कुशल से तो हैं?'

“हनुमान जी ने कहा, 'हे माता! कोसलपति श्रीराम जी सब प्रकार से सकुशल हैं। उन्होंने दस सिर वाले रावण को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है।'

सब बिधि कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा।। अविचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो।।

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