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सांस्कृतिक एकता का प्रतीक पुरी की रथयात्रा
Jyotish Sagar
|June 2023
नारद ने ही श्रीभगवान् से प्रार्थना की कि हे भगवान् आप चारों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप में मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्यजनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहें और महाप्रभु ने 'तथास्तु' कह दिया।
दक्षिण भारत में ओडीशा का पुरी क्षेत्र, जिसे 'पुरुषोत्तम पुरी', 'शंख क्षेत्र' एवं 'श्रीक्षेत्र' के नाम से भी जाना जाता है, भगवान् श्री जगन्नाथजी की मुख्य लीलाभूमि है। उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता श्री जगन्नाथजी ही माने जाते हैं। यहाँ की वैष्णव धर्म की मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथजी हैं। इसी प्रतीक रूप श्री जगन्नाथ से सम्पूर्ण जगत् का उद्भव हुआ है। श्री जगन्नाथजी पूर्ण परात्पर भगवान् हैं और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है। ऐसी मान्यता श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य पंच सखाओं की है।
पूर्ण परात्पर भगवान् श्री जगन्नाथजी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आररम्भ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए और इसके दर्शन लाभ के लिए लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश-विदेश के सुदूर प्रान्तों से आते हैं।
मोक्ष की प्राप्ति
शास्त्रों और पुराणों में भी रथयात्रा की महत्ता को स्वीकार किया गया है। स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा गया है कि रथयात्रा में जो व्यक्ति श्री जगन्नाथजी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुण्डीचा नगर तक जाता है, वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्री जगन्नाथजी का दर्शन करते हुए, प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोटकर जाते हैं, वे सीधे भगवान् श्री विष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं। जो व्यक्ति गुण्डीचा मण्डप में रथ पर विराजमान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को जाते हुए करते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
महाप्रसाद का गौरव
Esta historia es de la edición June 2023 de Jyotish Sagar.
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